जोधपुर.
विधानसभा के 1993 में हुए चुनाव के बाद से पुलिस को एक महिला विधायक का पता नहीं चल पा रहा है। अदालत में हाजिर होने के लिए कोर्ट सम्मन जारी करती रही, बमुश्किल पुलिस उसे तामील करा सकी। लेकिन विधायक का कोर्ट में हाजिर होना शायद उनकी शान के खिलाफ था इसलिए तामील के बावजूद कोर्ट में उपस्थित नहीं हुईं।
आखिरकार कोर्ट को उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी करना पड़ा। लेकिन पुलिस के लिए एक विधायक को गिरफ्तार करना शायद इतना आसान नहीं था। लंबे समय तक विधायक की गिरफ्तारी नहीं होने पर अदालत ने गिरफ्तारी का स्थायी वारंट जारी कर दिया लेकिन पुलिस अदालत को रटा-रटाया जवाब देती रही कि विधायक का पता नहीं चल पा रहा है।
खैर चौदह साल के वनवास के बाद सरकार को भी अपने विधायक की गिरफ्तारी की चिंता सताने लगी क्योंकि चुनाव जो सिर पर हैं। आखिरकार सरकार ने विधायक के खिलाफ चल रहा मुकदमा वापस लेने का हुक्म दे दिया। मामला वापस लेने की अर्जी अदालत में पेश हुई।
कोर्ट और पुलिस की 14 साल की जद्दोजहद समाप्त हुई अब विधायक कोर्ट से बरी होकर चुनाव के लिए तैयार हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं शहर विधायक सूर्यकांता व्यास की। जिनकी आम सभाओं व सार्वजनिक समारोह में पुलिस उनके इर्द-गिर्द होती है इसके बावजूद वह पुलिस को नजर नहीं आई।यहां तक कि वे कई सालों से विधानसभा में भी जा रहीं हैं, मगर पुलिस को मालूम नहीं ।
20 रुपए के लिए 14 साल कानूनी लड़ाई
वर्ष 1993 में शहर विधानसभा क्षेत्र से सूर्यकांता व्यास भाजपा की प्रत्याशी थीं। चुनाव के दौरान व्यास के पोस्टर, पेंपलेट, नारे व हर्ो्िडग सरकारी व गैर सरकारी इमारतों पर बगैर स्वीकृति के लगाए गए जिनसे भवनों के मूल स्वरूप में परिवर्तन हुआ। चुनाव के बाद प्रत्याशी को अपने खर्चे से इन्हें हटाना व साफ करवाना था लेकिन व्यास ने ऐसा नहीं किया।
इसपर नगर निगम ने 25 फरवरी 1994 को व्यास को नोटिस देकर 11 हजार 720 रुपए जमा करवाने को कहा। इसके बावजूद यह राशि जमा नहीं कराई गई। इस पर नगर निगम ने 15 मई 1994 को अदालत में उनके खिलाफ राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 1959 की धारा 198 के तहत इस्तगासा पेश किया।
इस पर कोर्ट ने सम्मन जारी किए जो बमुश्किल तामील हो सका। इसके बावजूद व्यास अदालत में हाजिर नहीं हुईं। तब कोर्ट ने 19 सितंबर 2000 को गिरफ्तारी वारंट व 2 दिसंबर 2000 को स्थाई गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। लेकिन खांडा फलसा थाना पुलिस उसे तामील नहीं करा सकी। यह मामला यदि कोर्ट में साबित हो जाता तो व्यास पर महज 20 रुपए का जुर्माना ही लगाया जा सकता था।
कानून का मखौल उड़ाया
मात्र बीस रुपए के जुर्माने से बचने के लिए विधायक ने इस मामले को 14 तक कोर्ट में अटकाए रखा व पुलिस की लापरवाही के चलते सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। इस मामले में 36 से ज्यादा पेशियां पड़ीं व कोर्ट के बहुमूल्य समय की बर्बादी हुई। आखिरकार नगर निगम ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष अग्रवाल की अदालत में मामला वापस लेने की अर्जी पेश की लिहाजा 30 जून को कोर्ट ने श्रीमती व्यास को बरी कर दिया।