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खुलने लगी ‘राज’ की परतें

अजमेर. blas दरगाह इलाके में सोमवार को खुफिया पुलिस की गिरफ्त में फंसा पाकिस्तान मुजाहिद्दीन फोर्स (पीएमएफ) का पूर्व सैनिक दरगाह बम ब्लास्ट के दौरान दरगाह इलाके में मौजूद था, इस घटना में उसकी लिप्तता के बारे में गहनता से तफ्तीश की जा रही है। उसके पास से संदिग्ध दस्तावेज भी मिले हैं। इसमें अजमेर, जयपुर और अन्य शहरों के नाम कोड वर्ड में लिखे हुए हैं। अजमेर में उसके सम्पर्क सूत्रों को भी खंगाला जा रहा है।

पाकिस्तान करांची का मूल निवासी अब्दुल अलीम करीब अट्ठाईस साल से दरगाह के पास सोलथम्बा में रह रहा था। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने और लिखने वाले इस शख्स ने 1999 में झूठा हलफनामा पेश कर पासपोर्ट और राशन कार्ड बनवा लिया था।

हलफनामे में उसने खुद को राजस्थान का मूल निवासी और अशिक्षित बताया था। उसने हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाकर पुलिस और प्रशासनिक तंत्र को गुमराह किया था। उसके पास से ऐसे कागजात मिले हैं, जिसमें कोडवर्ड में शहरों का ब्यौरा है।

जवानी के समय का उसका फोटो भी बरामद किया गया है, जिसमें खुद को अनपढ़ बताने वाला यह शख्स टाई पहने हुए अपटूडेट अफसर के वेश में है। इस आधार पर खुफिया पुलिस के अफसर उसे संदिग्ध मान रहे हैं। अब्दुल पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी या फिर आतंकी संगठन के नेटवर्क की कड़ी होने का भी शक है।

एएसपी (सीआईडी) गजानंद वर्मा ने बताया कि अब तक की तफ्तीश में अब्दुल अलीम के खिलाफ देश में घुसपैठ के बारे में पुख्ता साक्ष्य मिल गए हैं। इंटेलीजेंस के विशेषज्ञ अफसर उससे मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ कर रहे हैं। अजमेर में उसे शरण देने वालों के बारे में भी तफ्तीश की जा रही है।

दलाल का दखल
खुफिया पुलिस ने पाक घुसपैठिए का पासपोर्ट और राशनकार्ड जारी करने वाले अफसरों को भी जांच के घेरे में लिया है। अलीम ने बताया कि उसने हिदायत हुसैन नामक व्यक्ति के जरीए राशनकार्ड बनवाया था। पासपोर्ट भी उसने दलाल से बनवाया था। एएसपी वर्मा ने बताया कि झूठे शपथ पत्र का सत्यापन करने वाले नोटरी पब्लिक का रजिस्टर जांचा जाएगा। पासपोर्ट बनाने की प्रक्रिया में पुलिस तस्दीक पर भी सवालिया निशान लग गया है।

भारत के खिलाफ लड़ा था
पाक घुसपैठिया अब्दुल अलीम का कहना है कि वह 1960 से 1971 तक पाकिस्तान मुजाहिद्दीन फोर्स में था। भारत-पाक बॉर्डर पर जमीनी लड़ाई में उसने हिस्सा लिया था। हथियार चलाने और नक्शानवीसी में वह ट्रेंड है।

>> इसलिए गया बांग्लादेश..
पीएमएफ के पूर्व सैनिक अब्दुल अलीम का कहना है कि 1971 में बांग्लादेश बना था। इस दौरान पाकिस्तान में यह घोषणा कर दी गई कि पाकिस्तान का कोई भी नागरिक अपनी मर्जी से बांग्लादेश जा सकता है। पलायन करने वाले परिवारों को रेड क्रॉस के प्लेन से बांग्लादेश भेजा गया था, तब वह भी परिवार के साथ बांग्लादेश चला गया था।

>> सवालों का गोलमोल जवाब
अब्दुल अलीम खुफिया विभाग के अफसरों को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। पीएमएफ का पूर्व सैनिक होने के बावजूद नाई का काम ही क्यों चुना? यह काम बांग्लादेश में भी किया जा सकता था? पहचान छुपाने के पीछे आखिर क्या मंशा थी? करीब 28 साल अजमेर में रहने के दौरान पाकिस्तान और बांग्लादेश के कौन लोग उसके सम्पर्क में रहे? इन तमाम सवालों का अलीम संतोषजनक जवाब नहीं दे रहा है। जांच अधिकारियों को उसने अभी तक इस कहानी में उलझा रखा है कि वह ख्वाजा साहब के दर पर दम तोड़ने की ख्वाहिश लिए अजमेर में रह रहा था।

>> सफर भी कर चुका
एएसपी गजानंद वर्मा ने बताया कि अब्दुल अलीम झूठे हलफनामे से बनवाए गए पासपोर्ट से 22 फरवरी 2000 को बांग्लादेश गया था, जहां से वह एक महीने बाद 31 मार्च को वापस लौटा। उसने 1995 में राशनकार्ड और वोटर आईडी बनवाया था।

>> कोलकाता में बैंक अकाउंट
अब्दुल अलीम का का कोलकाता में बैंक में अकाउंट का पता चला है। अकाउंट में लेन-देन के बारे में तफ्तीश की जा रही है। आरोपी अलीम का कहना है कि वह बांग्लादेश से अवैध रूप से सीमा पार कर कोलकाता आया था, जहां उसने होटल में नौकरी की। इस दौरान उसे एक पीर बाबा मिले थे, वे उसे ख्वाजा साहब की दरगाह पर लाना चाहते थे, लेकिन वह बीच में ही गायब हो गए। वह खुद अकेला अजमेर आया था, यहां उसने नाई का काम सीखा। वह खुद को बंगाली बताता था।





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