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प्रधानमंत्री की चुनौतियां और अवसर

संपादकीय औपचारिक रूप से वामदलों की समर्थन वापसी के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने जहां एक ओर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हुआ है, वहीं दूसरी ओर इन चुनौतियों को अवसर में बदलने का मौका भी है।

फिलहाल तो सबसे बड़ी चुनौती किसी तरह अपनी सरकार बचाने की है। यदि सरकार बच जाती है तो उसके शेष बचे कार्यकाल का सार्थक उपयोग हो सकता है। पिछले चार साल के कार्यकाल में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के ऊपर सबसे बड़ा आरोप यही लगता रहा है कि उनकी सरकार आर्थिक मोर्चे पर सर्वाधिक विफल रही है।

इस विफलता की जिम्मेदारी भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था पर डालकर निश्चिंत होने का मतलब शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपा कर तूफान गुजर जाने का इंतजार जैसा है।

मनमोहन सिंह इस देश में आर्थिक सुधारों के जनक माने जाते हैं। बतौर वित्तमंत्री विरोधी भी उनकी सराहना करते हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि जिन मनमोहन सिंह ने 1991 में सरकार में आते ही शुरुआती तीन महीनों में ही प्रमुख आर्थिक सुधारों को लागू करने का राजमार्ग तैयार कर दिया, जिस पर बाद की सरकारें भी सरपट दौड़ती रहीं, वही मनमोहन खुद इस राजमार्ग पर एक भी कदम आगे बढ़ाने के लिए वामदलों की अनुमति का इंतजार करते रहे।

बीमा और बैंकिंग सुधारों से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और श्रम सुधारों तक अधिकांश मसले सरकार से हरी झंडी मिलने की बाट जोह रहे हैं। यह सही है कि देश के आर्थिक सुधार कार्यक्रम कभी भी पूरी तरह राजनीतिक दबावों से मुक्त नहीं हो पाए। लेकिन यह भी सही है कि दुविधाग्रस्त अर्थव्यवस्था न तो खुलेपन का कोई लाभ उठा पाती है और न ही बंधे होने के दुष्परिणामों से अपने को मुक्त कर पाती है।

सवाल यह है कि समाजवादी और अन्य छोटे-छोटे सहयोगी प्रधानमंत्री को इस संदर्भ में कितनी दूर तक जाने की छूट देने को तैयार होते हैं। वाम दलों की तरह उनकी प्रतिबद्धताएं बेशक उतनी कड़ी न हों, लेकिन अतार्किक वैयक्तिक सरोकार जरूर नकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।

खुद कांग्रेस पार्टी में भी आर्थिक सुधारों को ‘मानवीय चेहरा’ प्रदान करने की वकालत करने वालों की कोई कमी नहीं है। प्रधानमंत्री को अपनी प्राथमिकताएं तो तय करनी ही होंगी और उन पर दृढ़ता से अमल भी करना होगा। वरना जो भी थोड़ा-बहुत ‘अवसर’ दिखाई पड़ रहा है, उन्हें भी ‘चुनौतियों’ में तब्दील होने से नहीं रोका जा सकता है।





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