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आ गए दिन राजनैतिक लेन-देन के

आलेख.भारतीय राजनीति में बड़े पैमाने पर बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। जब चुनाव नजदीक हों तो यह असहज भी नहीं लगता। जब राजनीतिक पार्टियां, विशेषकर सत्ताधारी दल खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं तो अचानक विचारधारा, समझदारी भरा अर्थशास्त्र, धर्मनिरपेक्ष मूल्य और यहां तक कि राष्ट्रीय हित समेत सब मुद्दे हवा में तैरने लगते हैं। इस वक्त परिस्थितियां कहीं ज्यादा विकट हैं। 12 फीसदी मुद्रास्फीति ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी को तकरीबन असंभव बना दिया है, जबकि विपक्ष अपने साहसिक मोर्चे के बावजूद अभी भी भारी उलझन में है। लेफ्ट परमाणु करार के इस कदर विरोध में है कि वह अपने द्वारा समर्थित सरकार को गिराने से भी नहीं हिचक रहा, जबकि प्रधानमंत्री ने इस करार की खातिर अपनी ही सरकार को दांव पर लगा दिया। अब सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि पहल किसकी ओर से होती है।

वैसे हर कोई इस संदर्भ में एक प्लान-बी होने का दावा करता है। लेफ्ट तीसरे मोर्चे का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। यह भाजपा के साथ तो जा नहीं सकता और फिलहाल जो तीसरा मोर्चा है, उसने समाजवादी पार्टी के रूप में अपना प्रमुख खिलाड़ी खो दिया है जो लेफ्ट के यूपीए सरकार से समर्थन वापसी के बाद उसका खेवनहार बनने की तैयारी में है। इस खेल में इतना कुछ दांव पर लगा है कि कांग्रेस मुलायम सिंह का समर्थन हासिल करने के लिए अपने दो खास मंत्रियों को भी कुर्बान कर सकती है।

जिसके लिए गांधी परिवार को काफी झुकना होगा जिसका अब तक समाजवादी पार्टी से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। अब वही मुलायम सिंह प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं और यदि अफवाहों पर भरोसा किया जाए तो वे केबिनेट में किसी अहम मंत्रालय का जिम्मा संभालने की तैयारी में हैं। भारत-अमेरिका परमाणु करार के समर्थन के विचार को उनका मुस्लिम वोट बैंक किस तरह से लेता है, यह अलग मसला है। लेकिन हां, उन्हें कुछ दिनों के लिए मायावती से छुटकारा जरूर मिल जाएगा।

जहां तक लेफ्ट की बात है तो उनके परमाणु करार के विरोध को लोग ज्यादा तवज्जो नहीं देते, चूंकि उसके रोल मॉडल रूस और चीन दोनों ने प्रथम दुनिया के देशों के परमाणु क्लब में प्रवेश करने के लिए ऐसे ही करार पर दस्तखत किए हैं। उन्हें परमाणु करार से ज्यादा इस बात की चिंता करनी चाहिए कि पश्चिम बंगाल और केरल में उनका गढ़ ढह रहा है और जल्द चुनाव होने की दशा में उनकी सीटें कम हो सकती हैं। माकपा खुद ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में खुद को असहज पाती है जहां बाकी हर कोई बदलती दुनिया के साथ चलना चाहता है।

उनका टिके रहना केवल इस बात पर निर्भर है कि हमारे देश में राजनीतिक मुख्यधारा से खुद को अलग समझने वाले लोगों की तादाद आज भी काफी ज्यादा है। ऐसे में वे या तो क्षेत्रीय दलों को वोट देते हैं या फिर उन्हें अपनी समस्त नकारात्मक धारणाओं के लिए लेफ्ट ही भरोसेमंद नजर आता है।

इन हालात में क्षेत्रीय दल किसका पक्ष लेते हैं, यह देखना मजेदार होगा। शिवसेना ने पहले परमाणु करार का समर्थन किया, लेकिन भाजपा के दबाव में जल्द ही वह पीछे हट गई। इस तरह मुकरने से उन्हें नुकसान होगा, चूंकि उनका हिंदू वोट बैंक बढ़ती इस्लामिक शक्ति से निपटने के लिए भारत-अमेरिकी संधि के लिए बेकरार है। असल में यदि भाजपा सत्ता में होती तो वह भी इस करार से बिलकुल नहीं हिचकती। वह सत्ता में नहीं है, लिहाजा खेल बिगाड़ने का काम कर रही है। जहां तक शिवसेना की बात है तो यह पहली बार नहीं है जब उसने स्वतंत्र रुख अख्तियार करने की कोशिश की है। जब कांग्रेस ने प्रतिभा पाटील को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया तो सेना ने भाजपा के खिलाफ जाते हुए उनका समर्थन किया।

मजेदार बात यह है कि शिवसेना और भाजपा के मध्य दूरियां ऐसे दौर में बढ़ रही हैं, जब महाराष्ट्र में कांग्रेस की पकड़ ढीली हो रही है। दक्षिण में डीएमके और पीएमके के रास्ते अलग-अलग हो गए हैं, यद्यपि करुणानिधि ने अंबुमणि रामदास के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया, जैसा वे मारन बंधुओं के साथ कर चुके हैं। मायावती के लिए विकल्प कम होते जा रहे हैं, क्योंकि अब तक उनकी सबसे ठन चुकी है। लेकिन यह अजीब बात है कि सभी पार्टियां इस भरोसे के साथ कि उनके पास जादुई आंकड़ा है, उनसे जुड़ने के लिए इस कदर बेकरार हैं। पूरी संभावना है कि मायावती भाजपा के साथ जाएंगी और इसे उत्तरप्रदेश में वापस लाएंगी। और बिहार का क्या होगा? जब तक लालू कांग्रेस के साथ जुड़े हुए हैं, विपक्ष वहां सत्ता में बना रहेगा।

आगामी चुनावों में क्या होगा? मैं कोई भविष्यवक्ता नहीं हूं और जब राजनीति की बात आती है तो भारतीय लोग काफी जानकार नजर आते हैं। वे आखिरी समय तक अपने पत्ते नहीं खोलते। कोई बेवकूफ ही जल्दबाजी में आकलन लगा सकता है। लेकिन एक चीज तो साफ है। जब तक कांग्रेस कीमतों को नीचे नहीं लाती और करों में कटौती नहीं करती, यह नहीं बच सकती। इसने पिछले दिनों कुछ राज्यों में हुए चुनावों में सभी जगह मात खाई है। नई संसद के गठन से पहले यह बाकी राज्यों से भी हाथ धो बैठेगी। और जैसा कि कोई भी कहेगा कि मुलायम सिंह, देवगौड़ा और अजीत सिंह जैसे नए सहयोगियों के साथ भी इसकी जिंदगी कोई सुखद नहीं होने जा रही है। ऐसे दिन भी आ सकते हैं जब उन्हें वास्तव में लेफ्ट की कमी महसूस हो।

लेकिन गठबंधन राजनीति की भी अपनी ही मजबूरियां हैं। आपको सत्ता में आने के लिए हमेशा जनता का भरोसा ही नहीं जीतना पड़ता। इसके लिए आपके पास ढेर सारा धन होना चाहिए, आपकी कोई विचारधारा न हो और ऐसे गठबंधन से जुड़ने में रत्ती भर भी झिझक नहीं होनी चाहिए जो आपको सत्ता तक पहुंचा सके। क्या बात है, मैं जानता हूं कि यह थोड़ा-बहुत पुराने समय से चली आ रही हॉर्स-ट्रेडिंग जैसा लगता है कि लेकिन मेरे दोस्त, आपको लोकतंत्र के लिए यह कीमत तो चुकानी होगी।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार हैं।





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