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..और शुरू हुआ भारतीय हॉकी का स्वर्ण युग

जयपुर.hockey तीन बार दावेदारी पेश करने के बाद आखिरकार हॉलैंड के शहर एमस्टर्डम को 1928 में ओलंपिक मेजबानी का मौका मिला।

भारत ने पहली बार आधिकारिक रूप से ओलंपिक में भाग लेना शुरू किया और इसके साथ ही आगाज हुआ भारतीय हॉकी के स्वर्णिम युग का। भारत ने हालांकि 1900, 1920 व 1924 के ओलंपिक में भाग लिया था, लेकिन तब भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना नहीं हुई थी। संघ की स्थापना 1927 में हुई।

जयपाल सिंह के नेतृत्व में भारत ने पहली बार हॉकी में भाग लिया और फाइनल में मेजबान हॉलैंड को शिकस्त देकर इतिहास रच दिया। हॉकी के जादूगर नाम से मशहूर हुए ध्यानचंद ने टूर्नामैंट में कुल 14 गोल किए। हॉकी में नौ देशों के 137 खिलाड़ियों ने भाग लिया।

भारत ने बैल्जियम (9-0), डेनमार्क (5-0), स्विट्जरलैंड (6-0) व ऑस्ट्रिया (6-0) को हराते हुए चारों ग्रुप मैच जीते। फाइनल में भारत ने हॉलैंड की शक्तिशाली टीम को 3-0 से हराया और तीनों गोल ध्यानचंद ने किए।

स्वर्ण पदक का यह सिलसिला 1956 तक लगातार जारी रहा। यह पहला ओलंपिक था, जिसमें एशियाई देशों ने तीन स्वर्ण जीते थे। भारत के अलावा जापान की मिकीओ ने ट्रिपल जंप में तथा उनकी साथी योशियूकी ने तैराकी की 200 मी. ब्रैस्टस्ट्रोक में स्वर्ण जीता।

प्रज्वलित हुई मशाल
>> ओलंपिक में पहली बार मशाल प्रज्वलित की गई, हालांकि मशाल रैली 1936 से शुरू हुई।
>> पहली बार एथलीटों की परेड शुरू हुई, जिसमें सबसे आगे एथेंस (पहला मेजबान) व सबसे पीछे मेजबान देश के एथलीट थे। यह परंपरा आज भी प्रचलित है।
>> जॉनी वेसमूलर ने तैराकी में दो स्वर्ण जीते। बाद में वे कई टारजन फिल्मों में अभिनय करते नजर आए।
>> 1920 व 1924 में प्रतिबंधित किए गए जर्मनी को ओलंपिक में भाग लेने का फिर मौका मिला और वह तालिका में दूसरे स्थान पर रहा।
>> पोलैंड की हेलिना कोनोपेस्का ट्रैक व फील्ड चैंपियन बनने वाली पहली महिला एथलीट बनीं। इस ओलंपिक में 800 मीटर की दौड़ कई महिलाएं पूरी ही नहीं कर सकीं, जिसके चलते बाद में 1960 तक महिलाओं की 200 मीटर से अधिक की स्पर्धाएं नहीं हुई।





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