बीकानेर.
बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों को बनाकर हजारों लोगों के सपने पूरे कर दिखाने वाले मजदूर खुद अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा नहीं कर पाते। उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए पर्याप्त दाम और काम ही नहीं मिलता। भवन निर्माण में लगे दिहाड़ी मजदूरों को एक महीने में औसतन 20 दिन ही काम मिलता है।
इस हिसाब से वे वर्षभर में 240 दिन ही काम करवा पाते हैं। इन्हें प्रवासी मजदूरों की श्रेणी में रखा गया है। बढ़ी हुई महंगाई को देखते हुए इन्होंने भी अपनी दिहाड़ी बढ़ा दी लेकिन इसके बाद भी ये वर्ष भर में 30 हजार रुपए से अधिक नहीं कमा पाते। ऐसे में घर का खर्च चलाना भी मुश्किल होता है।
इन मजदूरों को घर-खर्च भी समय-समय पर उधार लेकर ही चलाना पड़ता है जिसे उसे चुकाने में वर्षो बीत जाते हैं। इन मजदूरों को ऋण और अन्य सुविधाएं दिलाने में सरकारीस्तर पर कोई योजना नहीं बनी है।
बीबी-बच्चों के साथ-साथ बुजुर्ग मां-बाप की जिम्मेवारी संभालने वाले इन मजदूरों की स्थिति तो यह है कि अगर कभी काम करते समय दुर्घटनाग्रस्त भी हो जाएं तो इलाज अपने स्तर पर करवाना पड़ता है। इस स्थिति में न तो मकान मालिक सहयोग करता है और न ही ठेकेदार। नत्थूसर गेट मंडी का अशोक राव कभी कारीगर हुआ करता था लेकिन छह महीने पहले कार्य के दौरान छेनी का टुकड़ा आंख में लगने से उसकी दृष्टि चली गई।
हालात यह हो गए हैं कि अब वह मजदूर बन गया है। इलाज में 90 हजार से अधिक का खर्च आया लेकिन मकान मालिक ने 14 हजार रुपए की आर्थिक सहायता ही दी।
कोटगेट पर काम की तलाश में पहुंचने वाले लक्ष्मण का कहना है कि शहर के मजदूर फिर भी तय की गई मजदूरी पर अडिग रहते हैं लेकिन गांवों से आने वाले मजदूर कम मजदूरी में भी काम पर चले जाते हैं।
गोगागेट मंडी पर खड़े रहने वाले रमजान अली का मानना है कि जब तक मजदूरों में एकता नहीं आएगी शोषण ऐसे ही होता रहेगा। काम की जरूरत सभी को है लेकिन मालिकों की हर शर्त के आगे झुकने से ही मजदूरों का भला नहीं हो पा रहा है।
बीकानेर में ही होता है लेबर का ठेका
बिल्डिंग और मकान निर्माण के लिए प्रदेश में बीकानेर ही अकेला ऐसा जिला है जहां लेबर का ठेका होता है। इस ठेके में रॉ-मैटेरियल मालिक स्वयं लाता है, लेबर के लिए ठेका दे देता है। लेबर का ठेका कम से कम 80 रुपए स्क्वेयर फीट के हिसाब से लिया जा रहा है। बीकानेर के अलावा प्रदेश के दूसरे जिलों में बिल्डिंग का निर्माण कार्य पूरा ही ठेके पर दिया जाता है।
बीकानेर में ठेके पर निर्माण की न्यूनतम दर 500 रुपए प्रति स्क्वेयर फीट है। इस दर में ठेकेदार मकान में मंजिये की टाइल्स तो लगा देगा लेकिन मार्बल का कोई काम नहीं करेगा। अगर मालिक अपने मकान में मार्बल और इटेलियन टाइल्स की चाहत रखता है तो उसे इस काम के लिए 650 रुपए स्क्वेयर फीट तक खर्च करने पड़ेंगे।
प्रशिक्षण ले या घर वालों का पेट भरे
जिला उद्योग केन्द्र की ओर से मजदूरों को प्रशिक्षित करने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाते हैं लेकिन मजदूर ऐसे प्रशिक्षणों में रुचि नहीं दिखा रहे।
मजदूरों का कहना है कि प्रशिक्षण के बाद भले ही सरकार की ओर से औजार दिए जाए लेकिन प्रशिक्षण अवधि में मानदेय नहीं मिलता। इस स्थिति में घर में रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। हमारे लिए प्रशिक्षण से ज्यादा मजदूरी जरूरी है। नत्थूसर गेट के गोपीराम भाट का कहना है कि जब शाम को घर पहुंचने के बाद घर वाले खाना मांगता है तो उस समय प्रशिक्षण से ज्यादा मजदूरी की याद आती है।
बच्चों को बड़ा आदमी बनाने की चाहत
हर मजदूर की चाहत है कि उसके बच्चे अफसर-डॉक्टर बनें। इस चाहत में वे कदम भी बढ़ाते है लेकिन जब उन्हें पांच दिन लगातार काम नहीं मिलता तो उनका यह सपना बिखरने लगता है। भाटों के बास में रहने वाले अशोक कुमार की इच्छा है कि उसका बेटा डॉक्टर बने ताकि उसके साथ नेत्र ज्योति चली जाने वाली घटना की पुनरावृत्ति किसी दूसरे के साथ न हो सके। ओडों के मोहल्ले के अबरार ओड की इच्छा है कि उसके बच्चे बड़े अधिकारी बने क्योंकि एक मजदूर के घर से निकला अधिकारी ही मजदूरों की पीड़ा को समझ सकता है।
वास्तु के लिए 25 हजार, चलवे की फीस खर्च की पांच फीसदी
भवन बनाने वाले हर व्यक्ति की चाहत यही रहती है कि उसका मकान सुखद फलदायी हो। इसके लिए वह वास्तु शास्त्री की सलाह भी लेता है। इस सलाह के एवज में वास्तु शास्त्री 10 से 25 हजार रुपए तक फीस वसूलता है। वास्तु शास्त्री जमीन के हिसाब से खुद नक्शा बनाता है और उस नक्शे को लागू भी करवाता है।
बिल्डिंग निर्माण में लगने वाले सिविल इंजीनियर निर्माण पर होने वाली राशि का पांच से 10 प्रतिशत अपनी फीस के रूप में लेते हैं। वे नक्शा बनाने के साथ-साथ वास्तु के कुछ महžवपूर्ण टिप्स दे देते हैं। इसके अलावा कुछ वास्तु शास्त्री भी हैं जो नक्शा बनाने वाले से मिलकर उन्हें गाइड करते हैं।
इस गाइडिंग के लिए वे बिल्डिंग मालिक से 500-2000 रुपए तक फीस लेते हैं। वास्तु शास्त्री आर.के. सुतार बताते हैं कि आजकल हर किसी की चाहत है कि उसका मकान वास्तु के अनुरूप बने लेकिन अधिकांश लोग वास्तु शास्त्री की सलाह नक्शा बनवाने तक ही लेते हैं। निर्माण कार्य के लिए लगने वाला चलवा भी एक निश्चित राशि फीस के रूप में लेता है। अधिकांश चलवे पूरे निर्माण के दौरान 5000 से 7000 रुपए तक अपनी फीस वसूल करते हैं।
विश्वकर्मा पेंशन और जनश्री योजना है मजदूरों के लिए
भवन निर्माण में लगे दिहाड़ी मजदूरों के लिए सरकार ने पिछले वर्ष ही विश्वकर्मी पेंशन योजना शुरू की है। इस योजना में मजदूरों को एक हजार रुपए जमा कराने होते हैं। इतनी ही राशि राज्य सरकार जमा करवाती है। इसके अलावा दिहाड़ी मजदूरों के वैलफेयर के लिए जनश्री बीमा योजना भी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए सरकार द्वारा चालू की गई है।
इन योजनाओं में बीकानेर के हजारों श्रमिकों ने फार्म भरे हैं। सरकार ने अपने न्यूनतम मजदूरी नियमों में संशोधन करते हुए अकुशल मजदूर के लिए 100, अर्धकुशल मजदूर के लिए 107 और कुशल मजदूर के लिए 115 रुपए न्यूनतम मजदूरी तय की है। श्रम निरीक्षक एवं समझौता अधिकारी कमल रंगा बताते हैं कि राज्य सरकार और श्रम मंत्रालय दिहाड़ी मजदूरों के उत्थान के लिए प्रयासरत है। सरकार की यही कोशिश है कि दिहाड़ी मजदूरों का शोषण न हो इसके लिए ही समय-समय पर न्यूनतम दिहाड़ी तय की जा रही है।