आज अगर पूरी दुनिया को एक जगह इकट्ठा किया जाए, तो हर छठवां इंसान भारतीय होगा। आज वैश्विक जनसंख्या का यह आंकड़ा लगभग 670 करोड़ पहुंच गया है। इसमें भारत की जनसंख्या लगभग 113 करोड़ है।
माना जाता है कि दुनिया भर में जनसंख्या वृद्धि को रोकने के प्रयासों के बावजूद यह संख्या लगभग आठ करोड़ प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। अगले 40 सालों में इस धरती पर 150 करोड़ लोग और बढ़ जाएंगे।
जनसंख्या वृद्धि और इसी से जुड़े हुए अन्य पहलुओं पर गौर करने और नीति निर्धारण के लिए हर वर्ष 11 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1968 में इस विचारधारा के साथ हुई थी कि सभी लोगों को अपनी संतानों की संख्या और उनके पैदा होने के समय को तय करने की आजादी है।
सच्चाई यह है कि 40 साल बाद भी गर्भ निरोध की सुविधाएं लाखों महिलाओं, पुरुषों और युवा लोगों की पहुंच से बाहर हैं। इस साल का जनसंख्या दिवस लोगों के अपने परिवार को नियोजित रखने के अधिकार को और उन सभी गतिविधियों को समर्थन देता है। इस वर्ष की थीम के रूप में इस विचार को चुना गया है: यह एक मौका है कि परिवार नियोजन के महत्व को विकास के मुद्दे के तौर पर समझा जाए, जिससे लैंगिक समानता, गरीबी, मां का स्वास्थ्य और मानव अधिकार की सुरक्षा हो सके।
हमारी पृथ्वी और उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, तो दूसरी ओर हमारे द्वारा बनाए गए ढांचागत सुविधाओं का जीवन और बनाने की गति भी सीमित है। वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती संख्या, महिलाओं को उनकी जरूरत के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता, जन्म दर में कमी लाना कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तुरंत कुछ किया जाना जरूरी है।
अगले 20 वर्षो में पूरी दुनिया की जनसंख्या की लगभग आधी की उम्र 15 से 25 वर्ष के बीच होगी। आज भारत की 41 फीसदी जनसंख्या की आयु 15 वर्ष से कम और 54 फीसदी की उम्र 25 वर्ष से कम है। दुनिया भर में भारत अपनी युवा शक्ति की वजह से एक उभरती हुई और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है।
यह भी सच है कि औसत जीवन आयु में वृद्धि के चलते भारत में भी 60 से 70 साल के स्वस्थ पर रिटायर्ड लोगों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। पश्चिमी देशों में तो वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसी तमाम व्यवस्थाएं हैं, लेकिन हमारे देश में न तो वृद्धाश्रम का चलन है और ना ही सामाजिक तंत्र। ऐसे में आने वाले दशकों में एक नई समस्या से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए।
जनसंख्या वृद्धि अधिकतर विकासशील देशों में हो रही है, जबकि औद्योगिक विकसित देशों में यह वृद्धि बहुत धीमी है, या नहीं हो रही है और कहीं-कहीं तो जनसंख्या घट रही है। यहां यूरोप का उदाहरण ध्यान देने योग्य है। अगले 30 से 40 सालों में यूरोप में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या वहां की पूरी जनसंख्या की 40 फीसदी तक पहुंचने की आशंका है और इस वजह से अर्थव्यवस्था को तेजी देने वाले क्षेत्रों में काम करने वालों की कमी हो सकती है। वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन, चिकित्सा-स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के ऊपर आने वाला खर्च भी कई गुना ज्यादा बढ़ जाएगा।
यूरोपियन सोशियोलॉजिकल एसोसियेशन के अनुसार इस उम्र के लोग समाज के लिए एक बड़ा और मजबूत रिसोर्स हैं जिसका उपयोग नहीं किया जा रहा है। एक उम्र के बाद रिटायर हुए लोगों को शेल्फ पर रखकर भूल जाने की प्रवृत्ति गलत है और फिर वह केवल सरकार द्वारा दिए जाने वाली पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा पर जिंदा रहें इससे ज्यादा अन्याय क्या होगा?
जनसंख्या के मामले में महिलाओं की भूमिका पुरुषों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। दुनिया भर में महिलाओं की एक बड़ी संख्या अपनी गर्भ धारण की उम्र में है या पहुंच रही है और उन्हें अपनी जरूरत के मुताबिक परिवार नियोजन की सुविधाओं की आवश्यकता होगी।
दीर्घकालीन स्तर पर छोटे परिवारों में ही परिवार और उसके सदस्यों की खुशहाली के सूत्र होते हैं। और इसी खुशहाली से जुड़े हैं स्थाई आर्थिक विकास के तार। असली बात यह नहीं है कि हमारी पृथ्वी पर कितने लोग रहते हैं, असली बात तो यह है कि उनमें से हरएक के जीवन का स्तर कैसे सुधारा जा सकता है। इससे जुड़े हुए मुद्दे भी आज की दुनिया में महत्व रखते हैं।
ऐसे में ऐसे कानून और नीतियां बनाई जाएं जिनसे कि महिलाओं और कन्याओं के अधिकारों की रक्षा हो, प्राथमिक शिक्षा मुहैया हो, प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के तौर पर उपलब्ध हों, महिलाएं सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम हों, एचआईवी संक्रमण रोका जाए और लिंगभेद आधारित हिंसा बंद हो।