दृष्टिकोण.
जब कभी समकालीन भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें अमर सिंह को ऐसे नेता के तौर खास स्थान दिया जाएगा, जिसने राजनीतिक और कॉपरेरेट भारत के बीच तथा पेज-वन व पेज-थ्री के बीच की खाई को पाट दिया।
वर्ष 2004 के चुनाव अभियान में साथ घूमते हुए उनके बारे में जानने का मौका मिला। हम पूरे दिन उत्तरप्रदेश के अंदरूनी इलाके की धूल भरी सड़कों पर चलते रहे और इस दौरान सपा के इस नेता ने ठाकुर समाज की कई रैलियों का संबोधित किया।
शाम को हम उनके साउथ दिल्ली स्थित आवास में डिनर पार्टी में थे, जहां कई बड़े सितारे और कॉर्पाेरेट टाइकूंस आमंत्रित थे। मैंने अमर सिंह से पूछा कि वे दिन में अपनी नेता की भूमिका और रात में पार्टीबाज के रोल के बीच तालमेल कैसे बैठाते हैं, तो उन्होंने अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ जवाब दिया- ‘मैं ढोंगी नहीं हूं। यदि अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी मेरे मित्र हैं तो मैं इसे दुनिया से क्यों छिपाऊं?’
बिन-बुलाए राजनीतिक मेहमान से लेकर सबसे चहेते नेता बनने तक अमर सिंह ने लंबा सफर तय किया है। वह भारतीय राजनेताओं की ऐसी नई पौध का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने इस खेल के परंपरागत नियमों को फिर से परिभाषित किया है।
अब राजनीतिक प्रभाव का मास-अपील से इतना लेना-देना नहीं है जितना कि चतुराई से संधियां करने में है। वह भले ही अपने ‘नेताजी’ मुलायम सिंह की तरह वोट जुटाने वाले राजनेता न हों, भले किसी लोकसभा की सीट के लिए चुनाव न लड़ें, लेकिन वह सपा जैसी पार्टी के लिए आज भी काफी अहम हैं। मुलायम की राजनीति उत्तरप्रदेश के राजनीतिक अखाड़े के दाव-पेंच तक सीमित रही।
यह अमर सिंह ही हैं जिन्होंने पैसे और ग्लैमर की दुनिया से उनका परिचय करवाया। एक तरह उन्होंने नया ट्रेंड स्थापित किया। आज तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियों में अमर सिंह स्टाइल के नेता मौजूद हैं। ऐसे नेता जो चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन जो बड़े-बड़े कारोबारियों से संबंधों के चलते अपनी पार्टी के आकाओं के लिए अपरिहार्य हैं।
सपा और यूपीए की हाल में हुई साझेदारी एक तरह से विशुद्ध व्यावसायिक करार है, जिसे बेहद चतुराईपूर्ण तरीके से ‘देशहित’ में बताया जा रहा है। समाजवादी पार्टी नाम की एक पारिवारिक कंपनी अपने गृह-राज्य में गहरी मुसीबत में है, जहां एकल स्वामित्व वाली फर्म, बहुजन समाज पार्टी इसके राजनीतिक और आर्थिक आधार को ध्वस्त करने पर तुली है।
एक और पारिवारिक कंपनी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी उतनी ही मुश्किल में है क्योंकि इसके सीईओ एक संप्रभु राष्ट्र के साथ एक समझौता करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अपनी ट्रेड यूनियन के दबाव के चलते कदम वापस खींचने के लिए मजबूर किया जा रहा है। लिहाजा दु:खदायी ट्रेड यूनियन से पल्ला झाड़ लेना और विरोधी कारोबारी घराने से गठजोड़ करना ही इसका एकमात्र हल है। यदि कॉर्पाेरेट संविलयन और अधिग्रहण कारोबारी जगत में चल सकता है तो राजनीति इससे अलग कैसे हो सकती है?
एक हद तक अमर सिंह का यह अवसरवाद उस राजनीतिक वर्ग को आईना दिखाता है, जो अपने हित से परे कुछ देखना ही नहीं चाहते। क्या ऐसी पार्टी के साथ गठजोड़ करना कांग्रसी नेतृत्व की अवसरवादिता नहीं है, जो कल तक उसका दुश्मन नंबर एक थी? क्या यूपीए के सहयोगियों ने इसका समर्थन नहीं किया जो किसी भी कीमत पर चुनाव टालने के लिए बेकरार थे? और क्या भाजपा वास्तव में नैतिक शुचिता की बात कर सकती है, जबकि उसका नेतृत्व मान चुका है कि मनमोहन सरकार को गिराने का प्रयास किया गया? यहां तक कि वाम दल भाजपा के साथ खड़े होने को कैसे जायज ठहराएंगे?
संभवत: एकमात्र अंतर यही है कि अमर सिंह अपनी राजनीति के स्वभाव के बारे में थोड़ा अधिक मुखर रहे हैं। इस सपा नेता को अपने एक कॉपरेरेट समूह के साथ जुड़ाव को लेकर कोई खास मुगालता नही है, लेकिन हकीकत यही है कि ऐसे और भी कई राजनेता हैं जो विशिष्ट व्यावसायिक हितों को साध रहे हैं, केवल वे सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं करेंगे।
संसद में कुछ विशेष औद्योगिक घरानों की ओर से सवाल पूछे जाते हैं; मंत्रालयों में परियोजनाएं मंजूर हो जाती हैं और किसी विशेष कारोबारी के पक्ष में निर्णय लिए जाते हैं; नौकरशाही में उनकी व्यावसायिक संबद्धता के लिए सचिवों को नियुक्त किया जाता है। ऐसे में जब अमर सिंह परोक्ष तौर पर वित्तमंत्री और पेट्रोलियम मंत्री के खिलाफ आवाज उठाते है, तो वह खुलकर कॉर्पाेरेट की जंग में आ रहे हैं, जहां दूसरे लोग यही काम छिपकर करते हैं।
ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही नहीं है। पूरी दुनिया में लॉबिंग करने वाले सत्ता की राह तैयार करते हैं, लेकिन अमेरिका जैसे देश में जहां लॉबिंग करने वालों की भूमिका को मंजूर कर लिया गया है, भारत में हम अब भी उनकी मौजूदगी को स्वीकार नहीं करना चाहते।
अमर सिंह जैसी शख्सियतों ने इस गोपनीयता को खत्म कर दिया है जो कारोबारी-राजनेता संबंधों के मध्य पाई जाती है। अत: प्रधानमंत्री निवास से राष्ट्रपति भवन तक भागदौड़ कर रहे अमर सिंह को देखकर संभवत: हमें इस बात को मानना होगा कि उनका अभ्युदय महज राजनीति की बदलती प्रकृति का नतीजा है। अब राजनीति को फंड-जुटाने, बड़ी-बड़ी संधियां करने और भारी धन से जोड़कर देखा जाने लगा है।
लेकिन हां, जहां राजनीति धन की मांग करती हैं, वहीं इसमें विचारों, जोश, समाज के लिए एक सोच और न्याय के लिए संघर्ष होना चाहिए। कॉर्पाेरेटीकृत राजनीति में लगता है कि ‘सोच’ के लिए ज्यादा स्थान नहीं है। महान दृष्टा, मोहनदास करमचंद गांधी बिड़ला हाउस में रहे और कारोबारी घरानों से निकटता के लिए भी जाने जाते थे, लेकिन उनका ध्यान अपने सामाजिक व राजनीतिक मिशन पर ही केंद्रित रहता था। किसी मिशन या महती उद्देश्य के बगैर महज धनबल का मतलब यही होगा कि सार्वजनिक जीवन सर्वजन के लिए नहीं रह गया।
- लेखक सीएनएन-आईबीएन के एडिटर इन चीफ हैं।