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संप्रग की जल्दबाजी का औचित्य!

संपादकीय. परमाणु करार पर हो रहे शह और मात के खेल से इसके चारों और रहस्य का ऐसा वातावरण बनता जा रहा है, जिसमें ‘संदेह’ के अलावा और कुछ पैदा होने की गुंजाइश कम ही है।

संप्रग सरकार की ओर से करार के सूत्रधार नियुक्त किए गए विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी की विश्वसनीयता आहत हो रही है। वे 6 जुलाई को वामदलों को चिट्ठी लिखकर यह भरोसा देते हैं कि 10 जुलाई को उनके साथ बातचीत के बाद ही सरकार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में जाने के बारे में कोई फैसला करेगी, लेकिन इससे पहले ही 8 जुलाई को जापान से प्रधानमंत्री यह ऐलान करते हैं कि सरकार ऊर्जा एजेंसी में जल्दी ही जा रही है।

इस पर वामदलों की समर्थन वापसी के बाद सरकार की ओर से एक बार फिर प्रणब दा प्रकट होते हैं और देश को यह भरोसा दिलाते हैं कि अब संसद में बहुमत प्राप्त करने के बाद ही सरकार ऊर्जा एजेंसी की ओर रुख करेगी लेकिन प्रधानमंत्री के स्वदेश लौटने से पहले ही करार का मसौदा वियना की इस अंतरराष्ट्रीय एजेंसी को भेज दिया जाता है।

सवाल यह उठता है कि जिस मुद्दे को लेकर देश में इतना बड़ा विवाद उठ खड़ा हुआ हो और जिस पर सरकार के सबसे बड़े सहयोगी दल ने समर्थन वापस लेकर उसे अल्पमत में पहुंचा दिया हो, उस मुद्दे पर बिना संसद के विश्वास मत दोबारा हासिल किए सरकार के आगे बढ़ने का औचित्य क्या है?

सरकार भोलेपन के साथ यह कह रही है कि यह तो प्रक्रियागत चीजें हैं, जो अपनी गति से चलती ही रहती हैं। अभी करार तो बाद की बात है, जिसके पहले विश्वास मत हासिल कर लिया जाएगा लेकिन कथनी और करनी के अंतर्विरोधों को देखते हुए यह ‘तर्क’ किसी के गले से नीचे नहीं उतरने वाला!

कुल प्रभाव यही बन रहा है कि जैसे सरकार को खुद विश्वास मत प्राप्त कर लेने का भरोसा न बन पा रहा हो और सरकार और करार दोनों खोने की आशंका से ग्रस्त होकर वह करार बचाने की कवायद में लग गई हो। जिस करार का मसौदा वह किसी को भी दिखाने से डर रही हो, उसे खुद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी कोई ‘गोपनीय’ दस्तावेज नहीं मानती।

सच तो यह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर आने से पहले ही यह अमेरिकी वेबसाइटों पर तैर रहा है। चीजों को जितना छिपाया जाएगा, उनके बारे में और उन्हें छिपाने वालों की नीयत के बारे में संदेह उतना ही बढ़ता जाएगा।





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