बीकानेर. स्कूल से कॉलेज में कदम रखने वाले नए विद्यार्थियों ने सरकारी कॉलेजों को प्राथमिकता दी है। 11 जून से शुरू हुई प्रवेश प्रक्रिया के तहत अब तक विद्यार्थियों का जो रुझान बना है।
गत साल की तरह इस बार भी निजी कॉलेजों में सीटें खाली रहना तय हो गया है। विद्यार्थियों को दी जाने वाली सहूलियत के मामले निजी कॉलेज चाहे कितनी ही उदारता बरते, मगर विद्यार्थियों की नजर में उनका दूसरा नम्बर आता हैं। बीकानेर में डूंगर और एमएस कॉलेज सरकारी कॉलेज हैं और प्रथम वर्ष में इनमें बीकानेर की अन्य कॉलेजों से ज्यादा सीटें हैं। इसके बाद भी हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी वेटिंग लिस्ट तक सिमट जाते हैं। इसके बाद यह विद्यार्थी निजी कॉलेजों की ओर रुख करते हैं।
सरकारी कॉलेजों के प्रति रुझान का मुख्य कारण फीस स्ट्रेक्चर, छात्रसंघ चुनाव, बड़ी लाइब्रेरियां,अनुभवी फैकल्टी, ड्रेसकोड से मुक्ति और खेलों की सुविधा है। हालांकि यह सुविधा निजी कॉलेजों में भी है लेकिन सरकारी जितनी नहीं। आजकल विद्यार्थियों के साथ-साथ अभिभावक भी इस बात को मानने लगे हैं कि अगर अच्छे नम्बर लाने हैं तो ट्यूशन करनी ही होगी।
यही धारणा निजी कॉलेजों के लिए समस्या खड़ी कर रही है। आज हर 100 में से 80 विद्यार्थी ट्यूशन का सहारा लेते है। चाहे वह कला संकाय हो, वाणिज्य या विज्ञान। विज्ञान और वाणिज्य संकाय में यह ट्यूशन करने वालों की संख्या सबसे अधिक है जबकि कला संकाय में भूगोल, अर्थशास्त्र, इतिहास,विशेष हिन्दी, विशेष अंग्रेजी, चित्रकला विषय में ट्यूशन की प्रवृत्ति अधिक है।
12 वीं कक्षा तक नियमित ड्रेसकोड में स्कूल जाने वाले विद्यार्थी, विशेषकर छात्र चाहते हैं कि कम से कम कॉलेज में तो वे अपनी मनपसंद ड्रेस में जा सके। इस कारण से भी वे सरकारी कॉलेज को पहली वरीयता देते है। छात्राओं पर उनके अभिभावकों की राय ज्यादा काम करती है।
जैन कन्या, बिन्नाणी दोनों में छात्राओं को ही प्रवेश दिया जाता है और दोनों में ही ड्रेस कोड लागू है जबकि छात्रों की बात करे तो डूंगर कॉलेज, जैन पीजी, रामपुरिया, एनएसपी पीजी कॉलेज, किसी में ड्रेस कोड लागू नहीं है। छात्रसंघ चुनाव भी एक ऐसा कारण है जो विद्यार्थियों को सरकारी कॉलेज में प्रवेश के लिए आकर्षित करता है। एक सरकारी कॉलेज का छात्रसंघ अध्यक्ष होने का रुतबा एक निजी या अनुदानित कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष से ज्यादा होता है। डूंगर कॉलेज का तो छात्रसंघ अध्यक्ष सक्रियता राजनीति में उतरता है। ऐसे कई उदाहरण भी है।
एकेडमिक डिग्री पर भारी हाथ का हुनर
कॉलेजों में सीटें खाली रहने का एक मुख्य कारण है ‘प्रतियोगी परीक्षाएं । 12 वीं पास करने के बाद विद्यार्थी, पीएमटी, पीईटी, सीपीएमटी, एआईईईई, आईटीआई आदि में प्रवेश को प्राथमिकता देते है। कला और वाणिज्य संकाय में 12वीं पास करने वाले विद्यार्थी आज डिग्री को उतना महत्व नहीं देते जितना हाथ के हुनर को। यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी आईटीआई में प्रवेश लेते हैं। विज्ञान संकाय में 12 वीं पास करने वाले पॉलीटेक्निक या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लेकर इंजीनियर बनना चाहते है। डाक्टर बनने वालों की भी काफी लंबी फेहरिस्त है।
कई तरह से देनी होती है ‘निजी कॉलेजों को फीस
सरकारी कॉलेजों में एक बार शुल्क जमा होने के बाद छात्र चिंता मुक्ता हो जाता है लेकिन निजी कॉलेजों में ऐसा नहीं है। छात्रों का कहना है कि प्राइवेट कॉलेज में नियम-कायदों की धौेंस होती है जबकि सरकारी कॉलेजों में मामला ‘आपसी अंडरस्टेडिंग’ पर चलता है। स्नातक में प्रवेश पाने वाले विवेक का कहना है कि सरकारी कॉलेजों में प्रयोगशाला और लाइब्रेरी की सुविधा अधिक पुख्ता होती है जबकि निजी कॉलेजों में लाइब्रेरी में किताबों की संख्या कम होती है।
निजी कॉलेजों में हो रहा कंपीटिशन
रोजाना खुल रहे निजी कॉलेजों ने भी पहले से संचालित निजी कॉलेजों की रोजी-रोटी में हिस्सा बांट लिया है। राज्य सरकार ने शिक्षा के प्रसार-प्रसार के लिए जगह-जगह निजी कॉलेजों को एनओसी जारी कर दी। इन नए कॉलेजों में भी चाहे सीटें पूरी नहीं भरी जा सके मगर वे अपने साथ दूसरे कई कॉलेजों को भी चपेट में ले लेते हैं।
बीबीए-बीसीए में प्रवेश का इंतजार
स्नातक में आर्ट्स, कामर्स व साइंस में भले ही निजी कॉलेजों में सीटें रिक्त रह गई हों लेकिन जिन कॉलेजों में बीबीए व बीसीए है वहां अभी भी प्रवेश के लिए मारामारी है। बिन्नाणी कॉलेज में बीसीए की 50 सीटें हैं और सभी सीटें भर गई। अभी भी 24 छात्र प्रवेश का इंतजार कर रहे हैं। कॉलेज प्रशासन ने 30 सीटें बढ़ाने का प्रार्थना-पत्र लगाया है। और स्वीकृति मिली तो सभी 80 सीटें भर दी जाएंगी। जैन कन्या कॉलेज में भी बीसीए की 30 सीटें हैं और 25 सीटें भर गई हैं।
आर्ट्स में सीटें रिक्त हैं लेकिन तीन प्रतिशत कम कर प्रवेश किए जाएंगे। शेष सभी वर्गो की सीटें भरी जा चुकी हैं। आर्ट्स में अभी भी छात्र वेटिंग में है लेकिन उनका प्रवेश नहीं हो पा रहा है।
-पंकज गोस्वामी, कार्यवाहक प्राचार्य डूंगर कॉलेज
आर्ट्स व कामर्स में सीटें रिक्त जरूर हैं लेकिन बीसीए में अभी भी छात्र प्रवेश के लिए भटक रहे हैं। इसी कारण सीटें बढ़ाने की कोशिश चल रही है। 30 सीटों की अनुमति मिल गई तो वे भी भर दी जाएंगी।
-पी.आर.जोशी, प्राचार्य, बिन्नाणी कॉलेज