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जिद जरूरी है जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए

बदलते सामाजिक और आर्थिक माहौल में आज हमारे चारों ओर चीजें बदल रही हैं और साथ ही बदल रहा है जीवन जीने का नजरिया। हर कोई चाहता है सफल होना और हो सके तो, दुनिया को बदलना। बहुत से लोग सफल भी हुए हैं, लेकिन उन सफल लोगों में एक भी ऐसा नहीं मिला, जिसने अपनी सफलता का श्रेय अपनी महत्वाकांक्षा को दिया हो। तो फिर प्रश्न यह है कि यदि महत्वकांक्षा ने नहीं, तो फिर किसने उन्हें सफल बनाया?

सन 1996 में जब इस बारे में दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला से पूछा गया, तो उन्होंने कहा था, ‘बस एक जिद, और कुछ भी करने का एक उफनता हुआ जोश।’ वाह! सचमुच कितने खूबसूरत शब्द हैं ये दोनों- जिद और जोश।

कुछ समय पहले तक टीवी पर साबुन का एक विज्ञापन आता था, जिसमें दाग को जिद्दी कहा गया था। सच यह है कि हम भारतीयों की चेतना में ‘जिद्दी’ शब्द एक नकारात्मक अर्थ के साथ मौजूद है- जिद्दी बच्च, जिद्दी आदमी आदि न जाने क्या-क्या। जो दूसरों की बात न मानकर अपनी ही बात पर अड़ा रहे, डटा रहे, उसे हम जिद्दी कहते हैं। यह अड़ियल होता है, इसलिए भला इसकी तारीफ कैसे की जा सकती है? हमारी संस्कृति ने तो हमें सिखाया है कि विनम्र रहो, झुककर चलो। जो जितना कोमल होगा, वह उतने ही लंबे समय तक चलेगा।

लेकिन जहां तक जिंदगी में सफलता हासिल करने का सवाल है तो यह उन्हीं लोगों के हाथ आई है, जिनके अंदर जिद्दीपन का ‘गुण’ रहा है। प्रभु श्रीराम ने अपने पिता की बात कहां मानी। पूरी प्रजा रो-रोकर उनसे रुकने की प्रार्थना करती है, किन्तु राम हैं कि अपनी बात पर ही अड़े हुए हैं। सीता जी ने भी राम की यह बात कहां मानी थी कि, ‘तुम वन में मत जाओ’।

वास्तव में ‘जिद’ को समाज चाहे जिस रूप में भी ले, लेकिन है यह एक तरह की ऊर्जा का स्रोत ही, जो हमारी चेतना में मौजूद रहकर, हमें लगातार एक प्रकार की ताकत देता है। कहीं न कहीं यह पॉवर सप्लायर भी है। द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिष्य बनाने से इनकार कर दिया, लेकिन एकलव्य ने ठान लिया कि मैं तो इन्हें ही गुरु बनाऊंगा। उसकी इस जिद ने द्रोणाचार्य की निर्जीव मूर्ति में प्राण फूंक दिए। आइंस्टाइन का लोग सम्मान तो करते थे, किन्तु उन्हें पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे जिद्दी किस्म के विद्यार्थी और व्यक्ति थे। शिक्षक तक का स्नेह वे नहीं पा सके। उन्हें अपने सिवाय किसी और की बात सही लगती ही नहीं थी। देशभर के नेताओं ने गांधीजी को बहुत समझाया कि ‘आप असहयोग आंदोलन को स्थगित न करें’, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे।

तो अब ऐसी जिद को हम कहें तो क्या कहें! वस्तुत: ऐसे लोगों के साथ दो मुख्य बातें होती हैं, जिसे न समझ पाने के कारण लोग इन्हें जिद्दी समझ लेते हैं। पहला होता है, इनका आत्मविश्वास। इन्हें अपने विचारों और सिद्धांतों पर इतना भरोसा होता है कि ये दूसरों की परवाह करने की औपचारिकता तक निभाने का व्यवहार नहीं निभा पाते। और दूसरा होता है- इनके अंदर मौजूद जोश, जिसे आप उत्साह, ऊर्जा, कर्मठता आदि कुछ भी कह सकते हैं।

यह जोश, यह कर्मठता इन्हें इस भय से ऊपर उठा देती है कि ‘मैं अपनी जिद के कारण एक दिन अकेला रह जाऊंगा,’ उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं रहती। लेकिन यहां गौर करने की बात यह है कि जिस प्रकार क्रोध तभी अच्छा होता है, जब वह गलत के प्रति हो, उसी प्रकार जिद भी तभी अच्छी होती है, जब वह सही के प्रति हो। गलत के प्रति की जाने वाले जिद से तो बेहतर है कि जिद की ही न जाए, ताकि उसे छोड़ने की नौबत ही न आए।

इतिहास बताता है कि लोगों ने जो सफलताएं परई हैं, वो इसलिए नहीं पाईं, क्योंकि उनके पास साधन थे और सुविधा थी। सफलताएं कभी भी सुविधाओं और साधनों का मोहताज नहीं हुआ करतीं। सफलता के लिए सबसे जरूरी तत्व होता है- साहस। और कहीं न कहीं इस साहस की बात जिद से ही जुड़ी होती है। बिना जिद के साहस आ पाएगा, इसमें संदेह है। अध्यात्म के क्षेत्र में तो जिद का अभाव हमारी मदद करता है, लेकिन विज्ञान और जिंदगी के क्षेत्र में उसकी कमी हमें लचर, लिजलिजा, कमजोर और कहीं न कहीं आराम पसंद बना देती है।

आप सोचकर देखें कि रांची जैसी छोटी सी जगह के सामान्य से परिवार का युवक धोनी यदि आज क्रिकेट का सबसे चमकता हुआ सितारा बन पाया है, तो ऐसा कहीं न कहीं उसकी कुछ कर दिखाने की जिद के कारण ही संभव हो सका है। भले ही आप इस बात की आलोचना करें, लेकिन मैं अपने लिए तो ईश्वर से यह प्रार्थना करूंगा ही कि, ‘हे प्रभु! मुझे थोड़ा सा ही सही, लेकिन जिद्दी जरूर बनाना, ताकि मैं कुछ बन सक। ।

-लेखक समय एवं जीवन-प्रबंधन के विशेषज्ञ है।





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