दृष्टिकोण.
ऐसा लगता है कि भारत और अमेरिका ने होकाइडो, जापान में हुए जी-8 देशों के सम्मेलन में ‘न्यूक्लियर टैंगो’ शुरू कर दिया। इस प्रस्तावित करार के तहत नई दिल्ली को अमेरिका से यूरेनियम और नाभिकीय तकनीक मुहैया हो सकेगी।
भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को भरोसा दिलाया है कि उनकी सरकार भारत-अमेरिका नाभिकीय ऊर्जा सहयोग समझौता 2007 को संसद से मंजूरी दिलवाने के लिए तैयार है।
मनमोहन सिंह ने इस मसले पर होकाइडो में रूस के राष्ट्रपति दिमित्रि मेदवेदेव और चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ से भी चर्चा की। मास्को व बीजिंग न्यूक्लियर क्लब, संयुक्त राष्ट्र की परमाणु मामलों की निगरानी करने वाली संस्था अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(आईएईए) और परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह(एनएसजी) के सदस्य हैं।
यद्यपि टैंगो नृत्य में दो लोगों की जरूरत होती है, लेकिन भारत-अमेरिकी ‘न्यूक्लियर टैंगो’ विशेष है, क्योंकि कम से कम चार और साझेदार वॉशिंगटन व नई दिल्ली द्वारा पहला कदम उठाए जाने का इंतजार कर रहे हैं। रूस उनमें से एक है, लेकिन यह अमेरिकी परमाणु कार्यक्रम से भारत के संभावित जुड़ाव को लेकर चिंतित नहीं है। मास्को को यूरेनियम के बाजार में वॉशिंगटन से होड़ लेनी होगी। यदि यह द्विपक्षीय समझौता हो जाता है तो अमेरिका को भारतीय परमाणु बाजार, जिसके तकरीबन 60-100 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, में प्रवेश मिल जाएगा।
परमाणु अप्रसार संधि(एनपीटी) तथा आईएईए से जुड़ने से इनकार करने वाले भारत ने वर्ष 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इसने पिछला परीक्षण 1998 में किया और इसके बाद इस पर जो प्रतिबंध लगाए गए, वे अब तक प्रभावी हैं। पाकिस्तान और इजरायल ने भी एनपीटी पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया, और उत्तर कोरिया ने आईएईए से कलह के बाद इसे खारिज कर दिया।
विएना में राजनयिकों ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि आईएईए बोर्ड ऑफ गवर्नर्स इस मसले पर 28 जुलाई को चर्चा करने की योजना बना रहा है। नई दिल्ली ने विशेष शर्र्तो के तहत आईएईए तक पहुंचने के लिए वॉशिंगटन को अपना मुख्य साझेदार चुना है। इसके सापेक्ष होने वाले जांच समझौते के तहत भारत सैन्य व असैन्य परमाणु कार्यक्रमों को क्रियान्वित करेगा और आईएईए विशेषज्ञों को इसकी असैन्य सुविधाओं की जांच की इजाजत होगी।
यद्यपि अमेरिकी कांग्रेस ने पिछले वर्ष इस समझौते को मंजूरी दे दी थी, लेकिन चूंकि इस पर आईएईए और एनएसजी से भी चर्चा होनी थी, लिहाजा इसे सिंतबर में ही कांग्रेस के समक्ष पेश किया जाएगा। कांग्रेस के शेड्यूल को देखते हुए अमेरिकी सांसद नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले शायद इसे न देख पाएं। व्हाइट हाउस का नया प्रशासन इन आरोपों के चलते इस समझौते पर फिर से विचार कर सकता है कि अमेरिका भारत को बहुत कुछ दे रहा है और बदले में बहुत कम मांग रहा है।
इसी बीच यह भी देखना होगा कि भारत के वामपंथी दल इस समझौते के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि इस समझौते के बाद भारत अमेरिका का पूरी तरह से पिछलग्गू बन जाएगा और वह स्वतंत्र तौर पर सैन्य व परमाणु नीतियां नहीं बना सकेगा।
हालांकि भारत के परमाणु वैज्ञानिकों और ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का इस करार को पूरा समर्थन है। भारत गंभीर ऊर्जा संकट से गुजर रहा है। इसे वर्ष 2017 तक 200 फीसदी ज्यादा बिजली (440 गीगावाट्स) पैदा करनी होगी, तभी वह अपनी मौजूदा 8 फीसदी विकास दर को बरकरार रख सकता है। भौगोलिक कारकों, भारतीय नदियों की दिशा और इसकी 1 अरब 20 करोड़ जनसंख्या का मतलब है कि हाइड्रो-इलैक्ट्रिक और थर्मल प्लांट्स ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से नाकाफी साबित होंगे।
भारत को वर्ष 2020 तक 20-30 गीगावाट्स बिजली की जरूरत होगी। इस लक्ष्य को पाने के लिए भारत, जो सालाना 300 मीट्रिक यूरेनियम का उत्पादन करता है, को अपने नाभिकीय रिएक्टरों के लिए प्रतिवर्ष 4000 मीट्रिक टन यूरेनियम चाहिए। लेकिन इस देश का भंडार महज 70000 मीट्रिक टन है, जो 15 वर्र्षो में खाली हो जाएगा। यह स्थिति यूरेनियम के आयात को अपरिहार्य बनाती है। भले ही अमेरिका भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह से पूरी नहीं कर सकता है, लेकिन वह देश को इसके नाभिकीर्य ईधन और तकनीक से तो जोड़ ही देगा।
वैसे पश्चिमी विश्लेषकों के मुताबिक भारत के परमाणु ऊर्जा बाजार के कम से कम 25 फीसदी हिस्से पर रूस का नियंत्रण होगा। मास्को व नई दिल्ली ने असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में मिलकर काफी काम किया है। रूस तमिलनाडु के कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट में 1000 मेगावाट के दो रिएक्टरों का काम पूरा कर रहा है। इसके अलावा उसने चार और रिएक्टर बनाने तथा इसके लिए अतिरिक्त तकनीकी मदद व संसाधनों की आपूर्ति का भी भरोसा दिलाया है।
नई दिल्ली द्वारा आईएईए और एनएसजी के साथ सुरक्षा मानकों संबंधी समझौतों पर दस्तखत के बाद परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के संदर्भ में भारत और रूस के मध्य एक समझौता हो सकता है। फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और ब्रिटेन ने भी ऐसे समझौतों का मसौदा तैयार किया है। यानी कि विश्व की परमाणु ताकतें भारत बाजार में प्रवेश के लिए बेकरार हैं।
हालांकि अतीत में मास्को ने समय-समय पर भारत को यूरेनियम की आपूर्ति की है, वह भी एनएसजी के बाकी सदस्यों के भारी दबाव को झेलते हुए, जो चाहते थे कि इसे खेल के स्थापित नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वर्ष 2001 में रूस ने तारापुर न्यूक्लियर प्लांट को यूरेनियम दिया। हालांकि, बाद में भारी दबाव के चलते मास्को को वर्ष 2006 तक यूरेनियम की आपूर्ति रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा और वॉशिंगटन के साथ अपनी शर्र्तो को तय करना पड़ा।
-लेखक मास्को स्थित आरआईए नोवोस्ती के राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।