संपादकीय. परमाणु करार पर जारी राजनीतिक हलचल के बीच यूपीए सरकार ने यह घोषणा की है कि वह 22 जुलाई को लोकसभा में शक्ति परीक्षण के लिए तैयार है। इससे जहां एक ओर लगता है कि यूपीए के राजनीतिक प्रबंधकों ने आंकड़ों के गणित को संभाल लिया है, वहीं यह संकेत भी मिलता है कि समाजवादी पार्टी के प्रति कांग्रेस का भरोसा बरकरार है।
दूसरी ओर सोनिया गांधी, लालू प्रसाद यादव और शरद पवार द्वारा वामदलों की प्रशंसा करने और उन्हें कोई भी कटु वचन न कहने से यह साफ है कि वे वामदलों के साथ संबंध मधुर बनाए रखना चाहेंगे। पिछले चार वर्र्षो में यूपीए सरकार की सफलता और विफलताओं में वामदल बराबर के साथी रहे हैं।
अमेरिका के साथ परमाणु करार करने पर वामदलों की आपत्ति शुरू से जगजाहिर थी, फिर भी यूपीए और वामदलों ने मिलकर ग्रामीण रोजगार गारंटी और तमाम अन्य योजनाओं को लागू करने में एक-दूसरे का साथ दिया। पर सोनिया गांधी ने परमाणु करार के मसले पर वामदलों के अलग होने के फैसले को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए कहा कि अब आगे देखने का समय है।
क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि यूपीए ने वामदलों का उपयोग केवल अपने विकास या अन्य एजेंडे के लिए किया, जिसमें परमाणु करार भी शामिल था? क्या यूपीए के कर्ता-धर्ता यह जानते थे कि अंत में करार के मामले पर यह साथ छूटना ही था? यदि हां, तो अब वामदलों के नाराज होने और कांग्रेस के प्रति कड़ा रुख अख्तियार करने के पीछे की भावना को समझा जा सकता है।
शायद लंबे समय के साथ के बाद ठगा सा महसूस करना इसी को कहते हैं। आने वाले दिनों में चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और यूपीए के बाकी घटक दल सरकार की उपलब्धियों को अपना बताते हुए वामदलों को कोई श्रेय शायद ही दें, पर देखना होगा कि वामदल यूपीए सरकार की उपलब्धियों में अपना कितना योगदान बताते हैं।
आखिरकार तो उन्हें भी कहना ही पड़ेगा कि उनकी यूपीए के साथ निभ नहीं पाई, इसीलिए उन्होंने समर्थन वापस लिया। चुनावी गणित में कांग्रेस, यूपीए के बाकी घटक दल या वामदल इस परिस्थिति का कितना लाभ उठा पाएंगे, यह तो आने वाले कुछ महीनों में पता चल ही जाएगा, पर कांग्रेस ने यह कहकर कि जरूरत पड़ने पर सरकार बनाने के लिए वह वामदलों का समर्थन फिर लेगी, वामदलों के सामने उनके इस्तेमाल किए जाने के एक और मौके की उम्मीद जगा दी है।