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अब बांझ गाएं दूध भी देंगी और बच्चे भी

भिलाई. khan बांझ गायों को पशुपालक बेवजह बोझ समझते हैं। ऐसे पशुओं को वे ठीक से चारा-पानी भी नहीं खिलाते। उन्हें खुला छोड़ देते हैं। आखिर में वे कत्लखाना ले जायी जाती हैं। अब ऐसा नहीं होगा, वे न केवल सामान्य गायों से अधिक दूध देगी बल्कि वह आठ से पंद्रह बच्चे भी जनेगी। इस तकनीक का इस्तेमाल केवल एक बार करना पड़ेगा। इसके बाद बांझ गाएं सामान्य गायों की तरह प्राकृतिक रूप से गाभिन होती रहेंगी।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) द्वारा प्रायोजित इस परियोजना पर डा. खान ने लगातार तीन साल तक रिसर्च किया। उन्होंने साहीवाल नस्ल की 40 बांझ गायों पर इंडेक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया। 40 में से 36 गाएं दूध देने लगीं और 34 गाएं बाद में प्राकृतिक रूप से गाभिन होकर बच्चे जनने लगीं।

मात्र 24 दिन में मिलेगा दूध
बांझ गाय को लगातार सात दिन तक सुबह शाम बारह घंटे के अंतराल में हार्मोस का डोज देते हैं। डोज का इंजेक्शन गर्दन में लगाया जाता है। सात से चौदह दिन तक उसे फिर खुला छोड़ देते है। डा. खान बताते हैं डोज पूरा होते ही यह मानना चाहिए कि गाय अब गाभिन हो गई है।

उसके लिए दाना-चारा की व्यवस्था भी उसी तरह करनी चाहिए, जैसे हम सामान्य गायों के गाभिन होते ही करते हैं। इसके बाद चौदहवें दिन से फिर सात दिन तक रोज उसके थन को पनहाते हैं। इससे थन विकसित होता है और प्राकृतिक रूप से आक्सीटोसिन हार्मोस बनना शुरू हो जाता है, जिसके कारण दूध बनता है। 24वें दिन से थन से अपने आप दूध टपकना शुरू हो जाता है।

310 दिन मिलेगा दूध
इस तरह से गाय का बांझपन दूर करने में 1200 से 1400 रुपए खर्च आता है। एक बार इस तकनीक से गाय गाभिन हो गई तो फिर दुबारा इसकी जरूरत नहीं पड़ती। वह फिर सामान्य गायों की तरह बच्चा जनेगी और दूध भी देगी।

साहीवाल नस्ल की गाएं रोजाना 3 से 10 लीटर और क्रास बीड इससे दो-चार लीटर अधिक दूध देगी। देशी गाय चारे की खुराक व अपने शरीर के हिसाब से दूध देगी। 180 से 310 दिन तक दूध ले सकते हैं। एक गाय से लगभग 16 हजार रुपए का दूध मिलेगा।

दूध में हार्मोस का असर नहीं
डा. खान ने अपने रिसर्च के दौरान हार्मोस के जरिए गाभिन हुई गाय के दूध और सामान्य गायों के दूध में मौजूद तत्वों का भी परीक्षण किया। जर्मनी से आयातित मिल्क एनालाइजर में किए गए टेस्ट में दोनों दूधों के तत्वों की मात्रा लगभग समान थी। फैट 4-6 प्रतिशत, प्रोटीन 3.5 से 4.5 प्रतिशत और एसएनएफ (खोवा की मात्रा) 8 से 10.5 प्रतिशत रहा, जो कि सामान्य है। हार्मोस का कोई अवांछित असर देखने को नहीं मिला। फिर भी ऐहतियात के तौर पर पहले सात दिन तक दूध मानव खुद उपयोग न कर उस गाय या इस तकनीक से जने बछड़े को पिलाने की हिदायत डा. खान देते हैं।

पशुपालक दुरुपयोग न करें
इस तकनीक का उद्देश्य बांझ गायों को कत्लखाना जाने से बचाना, अधिक दूध लेना ताकि पशुपालकों को फायदा हो और भारत में सबसे अच्छी माने जाने वाली साहीवाल नस्ल की गायों को बचाना है। सामान्य गायों से अधिक दूध लेने की चाह में पशुपालक इसका दुरुपयोग न करें इसलिए हार्मोस का नाम तकनीक को गुप्त रखा गया है। यदि कोई पशुपालक चाहेगा तो उन्हें हार्मोस का डोज उपलब्ध कराया जाएगा, परंतु पूरी तरह यह आश्वस्त होने के बाद ही कि वह बांझ गाय में ही इसका इस्तेमाल करेगा। इसके लिए किसान अंजोरा स्थित वेटनरी कालेज में संपर्क कर सकते हैं।

क्या है इंडेक्शन आफ लेक्टेशन
सबसे पहले उन्होंने गायों के बांझ होने का परीक्षण किया। प्रजनन के लिए तो होती है, परंतु गाभिन नहीं होती, बच्चदानी में इंफेक्शन और ओवरी में शिफ्ट तो नहीं है, इसका पता लगाया। उसके बाद प्रजनन संबंधी अनियमितता को ठीक करने हार्र्मोस का ई-टू और पी-फोर का डोज तैयार किया। ई-टू हार्र्मोस के डोज से बांझ गायों की ओवरी और पी-फोर से बच्चदानी व थन बिलकुल ही सामान्य गाभिन गायों की तरह हो गए। इसके बाद फिर थन में दूध बनने की प्रक्रिया अपने आप शुरू हो गई। बांझ गायों में ई-टू और पी-फोर का यह डोज एक अनुपात दो में दिया गया।





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