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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर.
पंचायतीराज के चलते मिले अधिकारों से महिलाओं की कुछ ऐसी तस्वीर उभर रही है,जिससे साबित होता है कि अवसर मिलने पर वे अपनी प्रतिभा साबित कर सकती हैं।
अंचल की दो महिला सरंपचों की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। शहर और गांव के बीच रहकर उन्होंने पंचायतीराज की मदद से महिला सशक्तिकरण को नई दिशा दी है। खासकर मुरैना के किशनपुर की सरपंच इंद्रावती यादव की काबिलियत पर सरकार ने उन्हें एक नहीं दो बार सम्मानित किया है।
.. नहीं छोड़ा इरादा
ग्वालियर में जन्मी, यहीं पली-बढ़ीं और स्नातक तक शिक्षा लेने के बाद घरवालों ने जब इंद्रावती की शादी मुरैना के एक छोटे से मजरे किशनपुरा (अब ग्राम पंचायत) के एक परिवार में तय की, तब शायद उन्होंने खुद असहज महसूस किया होगा। शहर की पढ़ी लिखी लड़की ने गांव की बहू बनने के बाद भी सब कुछ सहजता से लिया और हिम्मत नहीं हारी। नतीजा, पंचायतीराज में सफलता के कुछ ऐसे रंग जो दूसरों को प्रभावित किये बिना नहीं रहते।
दो बार मिला पुरस्कार
अपने परिश्रम से दूसरों के लिए मिसाल पेश करने वाली इंद्रावती के प्रयासों से किशनपुरा पंचायत को मप्र सरकार ने दो बार आदर्श ग्राम पंचायत के रूप में सम्मानित किया है। इसके लिए दोनों बार 25-25 हजार रुपए की राशि और प्रशस्ति पत्र मिला। 1994 से1999 और 2006-07 के कार्यकाल में यह सम्मान मिला। बालिका शिक्षा, महिला सशक्तिकरण के साथ वे विकास की नई इबारत लिखने में जुटी हैं।
बालिका शिक्षा पर जोर
1994 में पहली बार सरपंच बनने पर इंद्रावती की प्राथमिकता बालिका शिक्षा रही। उन्होंने किशनपुरा में सबसे पहले कन्या शाला खुलवाई। फिलहाल वे हाई स्कूल की मंजूरी लेने के प्रयास में हैं। इन्होंने गांव में लड़कियों को शिक्षित करने के लिए स्कूल चलो अभियान भी चलाया। साथ ही माधौपुरा और कीरतपुर में माध्यमिक शालाएं शुरू कराईं। इन शालाओं में गांव की लड़कियां पढ़ लिखकर अपनी जिन्दगी की नई इबारत लिखने की कोशिश कर रही हैं। इंद्रावती खुद इन शालाओं का समय-समय पर निरीक्षण कर बालिकाओं की शिकायतों पर गौर करती हैं।
नारी शिक्षा ही समृद्धि का आधार
गांव की पढ़ी लिखी बहू इंद्रावती कहती हैं- शिक्षित नारी ही घर-परिवार और समाज के विकास में मददगार बन सकती है। घर में महिला शिक्षित होगी तो वह पूरे परिवार को भी वैसा ही बनाना चाहेगी। गांव में महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ अभियान चलाकर उन्होंने गांव को इस बुराई से निजात दिलाई है। महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें इसके लिए उन्होंने महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोड़ा है। इन समूहों के माध्यम से अब वे दुग्ध डेयरी का संचालन करने की योजना बना रही हैं।
महिलाएं नहीं है किसी से कम
पंचायतीराज में विकास की नई इबारत लिखने वालों में चंबल के भिण्ड जिले की चौकी पंचायत की सरपंच कुसुम त्रिपाठी का नाम भी है। चौकी,बीसनपुरा और टीकरी गांवों की दो हजार की आबादी से मिलकर बनी ग्राम पंचायत की सरंपच कुसुम ने तीन वर्ष में गांव के विकास से लेकर वहां जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने,कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम और बालिका शिक्षा जैसे कार्यो को आगे बढ़ाने का काम किया है।
उनका सपना अपनी ग्राम पंचायत को आदर्श और निर्मल ग्राम पंचायत के रूप में सामने लाने का है। घर की चाहरदीवारी से बाहर निकलीं कुसुम इसके लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। वे कहती हैं- महिलाएं चाहें तो कुछ भी कर सकती हैं।