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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़. उसके खिलौने खामोश हैं। वे नहीं जानना चाहते कौन हैं आरुषि का कातिल? वे थक चुके हैं अपनी प्यारी आरुषि के नाम पर चल रहे ड्रामे से। वे कह पुकारकर ये सब नहीं कह सकते लेकिन दिल के कान लगाकर देखें तो यही सुनाई देगा। ऐसी आवाजें उन दोस्तों की भी होंगी जो आरुषि के साथ स्कूल में पढ़ते थे।
एक मासूम की हत्या को लेकर दो महीने तक चलने वाली छीछालेदारी से न केवल तलवार परिवार बल्कि हर वो संवेदनशील मन दुखी है जो इस घटनाक्रम को देख रहा है। सीबीआई की फाइंडिंग्स पर कितना विश्वास किया जाए, इससे अलग ये सब अपने दिल को संभालना चाहते हैं उस दुख से जो आरुषि के जाने के बाद उनपर टूट पड़ा है।
दोहरे हत्याकांड को लेकर जल्दबाजी में दिए गए बयान, पुलिस का एक्शन और सीनियर ऑफिसर्स की स्टेटमेंट..इन सबके अलावा मीडिया के रोल पर भी हमने बात की शहर के कुछ लोगों से।
कोर्ट के फैसले से पहले कोई अपराधी नहीं
कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जब तक किसी मामले की छानबीन चल रही है तब तक पुलिस जांच को लेकर कोई भी तथ्य कहीं सार्वजनिक नहीं हो पाए। जांच पुलिस और कोर्ट के बीच सीमित रहनी चाहिए। इस मामले में पुलिस से यही चूक हुई है। पुलिस से लेकर मीडिया और समाज को भी यह हक नहीं है कि वह अपना फैसला सुनाए। क्या यह जरूरी है कि किसी मामले की छानबीन में गिरफ्तारी की ही जाए। मामले में डॉ. तलवार की जल्दबाजी में गिरफ्तारी की गई। सुप्रीमकोर्ट की हिदायत है कि गिरफ्तारी किसी भी मामले की छानबीन में आखिरी हथियार है और वह भी तब जब कहीं से कोई सुराग नहीं मिल रहा हो। कानून में से आज किसी की भी जवाबदेही तय नहीं लेकिन कोर्ट का फैसला आए बगैर किसी को भी अपराधी नहीं माना जा सकता।
मामले की गहराई में जाना जरूरी
इस प्रकार के संवेदनशील मामले में ध्यान रखना होगा कि सभी तथ्यों की पड़ताल के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जाए। किसी भी व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा पर फैसला आए बगैर सवाल उठाना गलत बात है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था कि पुलिस ने गहराई से छानबीन किए बगैर ही एक तरह से डॉ.तलवार को अदालत का फैसला आने से पहले ही दोषी साबित कर दिया। वहीं मीडिया ने भी पुलिस की छानबीन पर भरोसा करते हुए मामले की कवरेज की। बेशक पुलिस पर दबाव और मीडिया को कंपीटीशन की चुनौती रहती है लेकिन इससे बचा जाना चाहिए था। दरअसल आज मीडिया अपनी पुरानी भूमिका को भूल रहा है कहीं न कहीं हमें अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सही तथ्यों की तह तक जाना ही होगा तभी मीडिया और पुलिस के प्रति जनता का विश्वास कायम रहेगा।
मामले से सीख लेने की जरूरत
इस मामले में अभी तक जो तथ्य सामने आए हैं उसमें एक बात ध्यान में रखनी होगी कि नौकरों पर विश्वास सोच समझकर किया जाए। रही बात पूरे मामले में पुलिस और मीडिया ट्रायल की तो लगता है कि पुलिस ने जहां मामले की सही तरीके से जांच नहीं की वहीं मीडिया इसी पुलिस जांच को आधार बनाकर दो महीने तक खबरें देता रहा। इससे एक बाप जिसकी बेटी का कत्ल हुआ न सिर्फ उसकी संवेदनाओं को चोट पहुंचाई गई बल्कि उसकी प्रोफेशनल और सोशल इमेज को भी खराब किया गया। यह मामला हमारे लिए एक उदाहरण होना चाहिए और हमें इससे सीख लेनी चाहिए।
कैसे होगी नुकसान की भरपाई
इस मामले में बहुत सी बातें सामने आई हैं लेकिन अगर एक लाइन में कहा जाए तो यह केस समाज के लिए आई ओपनर है। अब भी हमारी आंखें नहीं खुली तो और भी कई आरुषि जैसे मामलों का सामना करना पड़ सकता है। दो महीने तक चले इस ट्रायल में डॉ. तलवार को जो व्यक्तिगत और सामाजिक नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कौन करेगा ? सबसे पहले हमें भौतिकतावाद को छोड़कर मूल्यों पर आधारित परिवार और समाज कायम करना होगा। हालांकि यह समाज से लेकर पुलिस और मीडिया के लिए भी चुनौतीपूर्ण है।
पुलिस,मीडिया और दूसरी जांच एजेंसियों को ऐसे संवेदनशील मामलों को हेंडिल करते वक्त कई चीजों का ख्याल रखना होगा। बगैर जांच पूरी हुए पुलिस और मीडिया को इस प्रकार के मामलों में किसी निर्णायक भूमिका अपनाने से बचना होगा। इस मामले में काफी उतावलापन दिखाई गई है। लेकिन अगर समाज को आगे लेकर जाना है तो हमें तमाम प्रोफेशनल बाध्यताओं के बावजूद सच्चई सामने लानी होगी। आज फैमिली सिस्टम के साथ एजूकेशन और फैमिली बॉंड्स मजबूत करने होंगे। बच्चों को अपना अंग समझें और उनकी जरूरतों का ख्याल रखें। हम सबको मल्टीपल रोल निभाते हुए एक मॉडल तैयार करना होगा, तभी समाज बदल सकता है।
पुलिस हुई गैर जिम्मेदाराना
जिस तरह सभी एजेंसियों ने काम किया वह सबके सामने है। इसमें कोई शक नहीं कि जेसिका लाल व प्रियदर्शनी मट्टू मामलों में अगर मीडिया ने ट्रायल न किया होता तो दोषी साफ बच जाते। आरुषि मामले में पुलिस की गैरजिम्मेदाराना कार्रवाई के बाद मीडिया ने भी वही लाइन पकड़ ली। किसी भी मामले में कोर्ट का फैसला आए बगैर हमें किसी के चरित्र और उसकी सामाजिक छवि को ठेस पहुंचाने का कोई हक नहीं है। पुलिस को जांच पूरी हुए बगैर कोई भी तथ्य सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आगे निकलने की होड़ में क्वालिटी को भूल क्वांटिटी पर ध्यान केन्द्रित कर लिया है। इससे कहीं न कहीं मीडिया की छवि को ठेस पहुंची है।
सच को तो सामने आना ही था
सच्चई सामने आकर रहती है, लेकिन इससे पहले किसी भी व्यक्ति या परिवार का जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई का जिम्मेदार कौन होगा ? ऐसा ही मामला आरुषि हत्याकांड है। पुलिस की छवि और छानबीन की सच्चई सबके सामने है लेकिन उसके बाद आज जो सवाल सबके सामने हैं उसके जवाब किसी एक एजेंसी से नहीं बल्कि पूरे समाज से पूछने होंगे। मीडिया से क्या अपेक्षाएं हैं और उनको पूरा न करने वालों के प्रति जवाब क्या होना चाहिए इसका फैसला समाज को ही करना है।
अदालती फैसले से पहले निर्णय गलत: एरिका
शर्म की बात है कि पुलिस जिसे एक जिम्मेदार एजेंसी होना चाहिए उसने जांच पूरी होने और अदालती फैसले से पहले ही एक नाबालिग बच्ची के चरित्र पर इतने सवाल खड़े कर दिए। यही नहीं तलवार परिवार को प्रताड़ित किया गया। सबकी चर्चा का विषय आरुषि हत्याकांड ही रहा और सब अपने नजरिए से इस मामले में फैसला सुनाते रहे, जबकि सच्चई कुछ और ही निकली।
मामले में पुलिस जिम्मेदार
मामले में यूपी पुलिस ने जिस तरह से काम किया उसकी भरपाई किसी भी हालत में नहीं हो सकती। एक प्रतिष्ठित परिवार के साथ ही उनकी 14 साल की नाबालिग बच्ची की छवि खराब की गई उसके लिए सिर्फ यूपी पुलिस ही जिम्मेदार है। इस पूरे मामले में तथ्यों को दरकिनार करके गैर जिम्मेदाराना ढंग से काम किया गया। इस प्रकार के मामले में जल्दबाजी किस प्रकार घातक साबित हो सकती है इसका उदाहरण मिल चुका है। लिहाजा हमें सोचना पड़ेगा कि हम किस तरफ जा रहे हैं।