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Chhattisgarh
Raipur Raipur रायपुर. नोएडा में आरुषि मर्डर केस का खुलासा करते हुए सीबीआई की तरह छत्तीसगढ़ पुलिस शायद ही किसी मामले में यह कह पाए कि सारे फैक्ट साइंटिफिक जांच पर आधारित हैं। यहां की पुलिस अब भी थर्ड डिग्री समेत लाठीटेक तरीकों पर ज्यादा यकीन करती है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यहां साइंटिफिक तरीके से जांच के लिए संसाधनों का भी अभाव है।
गौरतलब है, यहां की पुलिस ने इंदिरा बैंक घोटाले को छोड़कर किसी भी मामले में आरोपियों का नारको टेस्ट नहीं कराया। साइको एनालिसिस और पालीग्राफी जैसे टेस्ट के बारे में थाने स्तर पर अमले को कम ही जानकारी है। कुछ अफसरों का तर्क है कि ज्यादातर साइंटिफिक टेस्ट कोर्ट में मान्य नहीं है, इसलिए इन्हें कराए जाने पर जोर नहीं दिया जाता।
राज्य प्रयोगशाला में झूठ पकड़ने वाला लाइ डिटेक्टर टेस्ट की सुविधा का दावा किया था, लेकिन वह भी अब तक शुरू नहीं हो पाया। बड़े मामले तो दूर छोटी-छोटी साइंटिफिक जांच के लिए पुलिस भटक रही है। शहर के हर थाने में डायटम टेस्ट और बिसरा रिपोर्ट की वजह से दर्जनों मामले लंबित हैं। पानी में मिले शव के बारे में अगर ये पता लगाना हो कि व्यक्ति डूबकर मरा या मारकर फेंका गया, तब डायटम टेस्ट जरूरी हो जाता है। इस रिपोर्ट के अभाव में हत्या के एक मामले में पुलिस अब तक चालान पेश नहीं कर सकी।
जांच रिपोर्ट के इंतजार में ही कई केस खात्मा-खारिज कर दिए गए। गौरतलब है कि नोएडा हत्याकांड में सीबीआई ने वे सारे टेस्ट कराए, जो किसी बड़ी मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने में जरूरी हैं। एम्स ही नहीं अहमदाबाद और बेंग्लूर की सेंट्रल फारेंसिक लैब के जरिए नारको, लाई डिटेक्ट, पालीग्राफी समेत आधा दर्जन टेस्ट कराए गए थे।
नहीं बना सिस्टम
कुछ वरिष्ठ अफसरों का मानना है कि साइंटिफिक टेस्ट की सुविधा से ज्यादा जरूरी सीबीआई की तरह सिस्टम तैयार करना है। कोई टीम तब तक उसी मामले में समर्पित तरीके से काम करते रहे, जब तक कोई रिजल्ट हाथ न लग जाए। इस दौरान उसे किसी अन्य जांच अथवा जिम्मेदारी भी न सौंपी जाए। कोई सिस्टम नहीं होने से केवल अफसर की काबिलियत पर मामले की जांच टिकी होती है।
साइंटिफिक जांच में उलझे मामले
बिल्डर राजेंद्र निगम की मौत के सवा साल बाद सेंट्रल फारेंसिक लैब चंडीगढ़ की रिपोर्ट से उनकी हत्या की पुष्टि हुई, लेकिन दुर्ग पुलिस अब इसमें पूरी तरह उलझ चुकी है। टिकरापारा इलाके में चार साल पहले महिला सिपाही की संदिग्ध मौत की जांच के लिए स्कल्स चंडीगढ़ भेजा गया। उसकी डीएनए जांच कोलकाता से कराई गई। रिपोर्ट में विलंब की वजह से मामले चार साल से इन्वेस्टिगेशन में है।
नारको टेस्ट दो जगह
नारको टेस्ट मेडिकल एक्जामिनेशन पर आधारित होता है। इसमें संदेही को ड्रग्स का डोज दिया जाता है। अर्धचेतन अवस्था में उससे आपरेशन थिएटर में सच उगलवाने के लिए सवाल किए जाते हैं। यह सुविधा बेंग्लूर और अहमदाबाद में है। गौरतलब है कि इंदिरा बैंक घोटाले के मुख्य आरोपी उमेश के नारको टेस्ट में घोटाले के संबंध में महत्वपूर्ण बात नहीं उगलवाई जा सकी।
टेस्ट को कोर्ट में मान्यता
पालीग्राफी और लाई डिटेक्टर टेस्ट की प्रक्रिया एक-दूसरे के ठीक विपरीत है। लाइ डिटेक्टर टेस्ट में संदेही से सवाल पूछे जाते हैं और मशीन के जरिए इनके जवाबों के सच झूठ का परीक्षण किया जाता है।
अफसरों ने बताया कि पालीग्राफी टेस्ट की रिपोर्ट की मान्यता कोर्ट में भी है। इसमें संदेही को वारदात से संबंधित रिकर्ा्िडग सुनवाई जाती है। इस दौरान उसके मस्तिष्क में होने वाले बदलाव की गणना कंप्यूटर करता रहता है। इसकी रिपोर्ट के परीक्षण के आधार पर सच झूठ का पता लगाया जाता है। यह टेस्ट सेंट्रल फारेंसिक लैब बेंग्लूर समेत चुनिंदा प्रयोगशाला में ही होता है।
कुछ प्रकरण में पहले भी साइंटिफिक टेस्ट कराए गए हैं। इसके महत्व को ध्यान में रखकर भविष्य में भी टेस्ट कराए जाते रहेंगे।
अमित कुमार, एसपी, रायपुर