बीकानेर. रविवार से चातुर्मास शुरू हो जाएगा। देवशयनी एकादशी से शुरू होने वाले चातुर्मास में मांगलिक कार्यो पर विराम लग जाएगा। यह विराम नवंबर में देवउठनी एकादशी के दिन खत्म होगा।
चातुर्मास के दौरान शहर में जगह-जगह पर प्रवचन, कथा और दान-पुण्य का जोर रहेगा। ज्योतिर्विद पंडित हरिनारायण व्यास ‘मन्नासा’ बताते हैं कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को चातुर्मास शुरू होता है। देवशयनी एकादशी को मोक्षदायनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन उपवास करके सोना, चांदी, तांबे या पीतल की मूर्ति बनवाकर पूजन करें।
शास्त्रों में बताया गया है कि चातुर्मास में अपनी रुचि के पदार्थो का त्याग करना चाहिए। चातुर्मासीय व्रत में पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद, दूसरे के दिए दही-भात, मूली, बैंगन आदि का त्याग करना चाहिए। मन्नासा बताते हैं कि चातुर्मास के दिनों में मधुर स्वर के लिए गुड़, दीर्घायु अथवा पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल, शुत्रनाशादि के लिए कडुवे तेल, सौभाग्य प्राप्ति के लिए मीठे तेल और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करना चाहिए।
इन दिनों में देह शुद्धि के लिए व्यक्ति को परिमित प्रमाण के पंचगव्य का, वंशवृद्धि के लिए नियमित दूध का, कुरुक्षेत्रादि के समान फल मिलने के लिए पात्र की बजाय पत्र में और पुण्यफल प्राप्ति के लिए एकमुश्त, नकव्रत, अयाचित भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करना चाहिए।
चातुर्मास में अपनाएं ये नियम
देव शयन की अवधि में कुछ नियम अपनाकर देवों को प्रसन्न किया जा सकता है। ज्योतिर्विद पंडित हरिनारायण व्यास ‘मन्नासा’ बताते हैं कि चातुर्मास के दिनों में भगवान विष्णु की पूजा की जानी चाहिए। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पंचामृत स्नान कराना चाहिए। इसके अलावा नित्य भोजन के भोग में तुलसी अर्पित करें।
प्रतिदिन शाम के समय दीप दान करके भी देवों को खुश किया जा सकता है। चातुर्मास के दौरान वस्त्रों का दान किया जाना श्रेष्ठ रहता है। भगवान विष्णु के सामने नित्य एक सौ आठ गायत्री मंत्रों का जाप करना श्रेष्ठ फलदायी रहता है। चातुर्मास में भगवान शिव की स्तुति और शिव प्रतिमा का दान करना भी बताया गया है। नियमित रूप से भगवान सूर्य को अध्र्य दे और गायत्री मंत्र पर तिल या अन्न की हवन मंडप में आहुतियां दें।
इन वस्तुओं का करें दान
चातुर्मास के दौरान दान करने का विशेष महात्म्य है। इस अवधि में व्यक्ति अपने सामथ्र्य अनुसार उत्तम ध्वनि वाले घंटे का, तांबे के पात्र का, तिल-तेल, अन्न एवं वस्त्रों का दान, गोदान, स्वर्णदान, चांदी के पात्र में गुड़ का दान, शय्यादान, शाक या फलों का दान करें। इसके अलावा चावल, जौ, सौंठ, मिर्च, पीपल, हल्दी का दान और बैल दान किया जाना चाहिए। चातुर्मास अवधि में ब्राrाणों को भोजन भी करवाना चाहिए।