Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
यह कितनी अजीब बात है कि प्राय: सफल सितारों को पटकथा परखने की परख नहीं होती। आज के बादशाह शाहरुख खान ने ‘पहेली’, ‘अशोका’ और ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ में न केवल अभिनय किया, वरन इन फिल्मों का निर्माण भी किया। उनकी ‘ओम शांति ओम’ सफल फिल्म रही, परंतु उसे श्रेष्ठ पटकथा नहीं कहा जा सकता।
फिल्म के प्रारंभ में ही नायक-नायिका की प्रेम कहानी का क्या अर्थ है जब नायिका न केवल विवाहित है वरन गर्भवती भी है। इसी तरह ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ में दिन-दहाड़े कत्ल करने वाले को फांसी से बचाने के लिए पूरा देश सड़क पर आंदोलन करता है। शाहरुख को चोपड़ा और जौहर की फिल्मों में सफलता मिली है, जो उससे पटकथा पर राय नहीं लेते।
यही हाल अमिताभ बच्चन का रहा है। कुछ वर्षो के अंतराल के बाद उन्होंने मेहुल कुमार जैसे अत्यंत कमजोर निर्देशक की ‘मृत्युदाता’ में काम करना पसंद किया। हरिवंशराय बच्चन के बेटे को मालूम होना चाहिए था कि ‘मृत्युदूत’ है, परंतु ‘मृत्यु’ जैसी हकीकत के साथ ‘दाता’ कैसे जुड़ सकता है। अमिताभ ने ‘मेजर साहब’ और ‘अक्स’ जैसी पटकथाओं पर पैसा लगाया। अमिताभ को भी सफलता उन निर्देशकों के साथ ही मिली, जिन्होंने उनसे अपनी पटकथाओं पर सलाह नहीं ली।
रितिक रोशन ने ‘फिजा’,‘मिशन कश्मीर’, ‘यादें’, ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ इत्यादि पटकथाओं को पसंद किया था। उन्हें सफलता पिता राकेश रोशन की फिल्मों में ही मिली है। बहुत शोर था कि ‘कृश-२’ की पटकथा में रितिक अपने पिता का साथ दे रहे हैं। आज तक वह पटकथा बन नहीं पाई।
सलमान खान के लिए कभी पटकथा काम करने का मानदंड नहीं रही। सलमान उन्हीं के साथ काम करते हैं, जो उन्हें पसंद हैं। इस अलबेले खान को समझना भी कठिन है और समझाना उससे भी मुश्किल है। सुना है कि सूरज बड़जात्या और संजय लीला भंसाली की फिल्मों में हास्य प्रसंग सलमान ने गढ़े हैं। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि ऐसे निर्देशकों के साथ काम करने के बावजूद सलमान खान ने अपनी लोकप्रियता कायम रखी है।
आज के लोकप्रिय सितारों में केवल आमिर खान को ही पटकथा की समझ है। ‘लगान’ और ‘तारे जमीं पर’ को चुनना और उन पर दांव लगाना यह सिद्ध करता है कि उन्हें पटकथा की गहरी समझ है। अब्बास टायरवाला की ‘जाने तू.. या जाने ना’ साधारण कथा है, जिस पर इम्तियाज अली पहले ही ‘सोचा न था’ नामक फिल्म बना चुके थे। यह पटकथा ही है, जिसने ‘जाने तू..’ को सफल बनाया। इसमें भी आमिर का सहयोग है। सुपरसितारों को पटकथा की समझ नहीं होना केवल आज के सितारों की बात नहीं है। पहले भी यह होता आया है।
सफलता के कारण जुबली कुमार कहलाने वाले राजेंद्र कुमार ने बतौर निर्माता इक्का-दुक्का फिल्मों को छोड़कर असफल फिल्में ही बनाई हैं। उन्होंने अपने पुत्र कुमार गौरव के लिए भी खराब पटकथाएं ही चुनीं। इसके पहले के दौर को भी देखें- दिलीप कुमार जैसे विलक्षण कलाकार ने केवल उन निर्देशकों के साथ सर्वश्रेष्ठ फिल्में दीं, जो उनसे पटकथा पर कोई राय नहीं लेते थे मसलन बिमल रॉय, महबूब खान, अमिय चक्रवर्ती, बलदेवराज चोपड़ा, के आसिफ इत्यादि। बाद के दौर में दिलीप कुमार ने दखलंदाजी शुरू की और अनेक हादसे घटे। इसी तरह लोकप्रिय सितारे देव आनंद के कैंप में विजय आनंद पटकथा समझते थे। स्वंय देव आनंद ने ढेरों डब्बे बनाए हैं।
दरअसल सिनेमा निर्देशक का माध्यम है और पटकथा उसका काम है। हमारे देश में सितारों को लोकप्रियता के साथ धन भी निर्देशक से ज्यादा मिलता है, इसलिए हमें लगता है कि उन्हें पटकथा की समझ है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि अधिकांश लोकप्रिय पटकथा लेखक अपने विषय में पारंगत नहीं हैं। उन्हें केवल हॉलीवुड की फिल्मों के टुकड़े भारतीय कथानकों में चस्पा करने का काम ही आता है। इन्हीं कारणों से हम प्रतिवर्ष नब्बे फीसदी असफल फिल्में बनाते हैं।