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घर के जोगी मनमोहन, आन गांव के सिद्ध

दृष्टिकोण. politics वामपंथियों ने वैसे कभी महसूस नहीं होने दिया कि राजनीतिक रूप से समूचे देश को उनकी कोई जरूरत है। पर अमेरिका के साथ परमाणु करार पर चल रहे घमासान के मार्फत देश को पता चला कि संसद में उनकी संख्या लोकसभा के कुल सदस्यों के दस प्रतिशत से अधिक है और वे सरकार को गिराने की हैसियत भी रखते हैं।

वामपंथियों की राष्ट्रीय परिदृश्य पर उपस्थिति के बारे में देश को राजनीतिक रूप से पहली जानकारी वर्ष 1975 में मिली थी। तब उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल का बिना शर्त समर्थन किया था। इसका परिणाम बाद में कांग्रेस ने भी भुगता और वाम पार्टियों ने भी, चाहे थोड़े समय के लिए ही क्यों न सही।

वामपंथी और कांग्रेसी हमेशा से ही दिल्ली में दोस्त भी बने रहे और पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा आदि राज्यों में दोस्ताना अंदाज में दुश्मनी भी निभाते रहे। अत: किसी को उम्मीद नहीं थी कि एक ऐसे मसले पर जिसमें उस जनता की रुचि कम से कम है, वामपंथी दल सरकार को गिराने तक की जोखिम मोल ले लेंगे।

जितनी तैयारी कांग्रेस ने वामपंथ के तनाव से अपने को मुक्त होने में दिखाई उससे कहीं ज्यादा तत्परता वामपंथी दलों ने कांग्रेस को एक ऐसे अवसरवादी गठबंधन में धकेलने में प्रदर्शित की जिसमें यूपीए को सरकार बचाने के लिए जेलों में बंद शहाबुद्दीन, पप्पू यादव व सूरजभान सिंह जैसे महानुभावों के वोट प्राप्त करने में भी कोई शर्म नहीं आएगी। परमाणु करार पर चल रही तकरार ने ‘देश हित’ की परिभाषाएं ही बदल डाली है।

वामपंथी अपने केलकुलेशन में मात खा गए कि कांग्रेस को वैचारिक रूप से भी उनकी उतनी ही जरूरत है जितनी कि यूपीए को सत्ता में बनाए रखने के लिए उनका बैसाखियों के रूप में इस्तेमाल करने में। वामपंथी दल ज्यादा ईमानदार दिखने के चक्कर में बेईमानी के शिकार हो गए।

इंदिराजी के जमाने की कांग्रेस को वामपंथी विचारधारा के समर्थन की जरूरत और सोनिया गांधी के जमाने की यूपीए को वामपंथी दलों के टेके की आवश्यकता - दोनों स्थितियों के बीच बुनियादी फर्क है। उस समय वामपंथी विचारधारा रखने वाले लोग तो इंदिराजी के मंत्रिमंडल में ही सिपहसालार बने हुए थे। तब हम रूस से सिर्फ भौगोलिक रूप से ही नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी नजदीक थे।

आज के वामपंथियों की इस खूबी की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देने दिया गया कि उन्होंने सरकार का अंदर से हिस्सा बनना स्वीकार नहीं किया और मंत्रिमंडल से बाहर रहते हुए भी मनमोहन सिंह को राज भी करने का पूरा मौका दिया।

यूपीए की सरकार बचाने के लिए अवसरवादी राजनीतिज्ञ जिस तरह की सौदेबाजी कर रहे हैं उसमें इस फर्क को टटोला जा सकता है कि वामपंथियों ने सत्ता में भागीदारी को लेकर कभी लार नहीं टपकाई। इस बात का लेखा-जोखा होना बाकी रहेगा कि पी. चिदंबरम अगर पूरी तरह से बड़े औद्योगिक घरानों की गिरफ्त में नहीं पहुंच पाए तो उसका बहुत कुछ श्रेय वामपंथियों के आक्रामक रवैये को जाता है।

भविष्य निधि पर दिए जाने वाले ब्याज की दर को कम करने का मामला हो या सार्वजनिक क्षेत्र की लाभ देने वाली इकाइयों में डिसइन्वेस्टमेंट का, वामपंथियों ने सरकार पर नकेल डाले रखी। अब जो हो रहा है वह यह कि समाजवादी पार्टी के नेता अमरसिंह सरकार को बचाने में भी लगे हैं और मुकेश अंबानी के खिलाफ अनिल अंबानी को लाभ पहुंचाने में भी। मतलब कि वामपंथियांे से मुक्त होते ही सरकार की राजनीतिक आत्मा सार्वजनिक क्षेत्र से बाहर निकलकर निजी क्षेत्र के शरीर में प्रवेश कर गई।

जानकारों का विश्लेषण है कि पिछले दिनों चली देश की राजनीति में एक टेक्टीकल भूल कांग्रेस ने की और दूसरी वामपंथियांे ने। गुलाम नबी आजाद जानते थे कि पी.डी.एफ. द्वारा उनकी सरकार से समर्थन वापस लेने के पीछे मूल कारण अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन नहीं बल्कि कुछ और है।

कांग्रेस अगर राजनीतिक बुद्धिमत्ता दिखाती तो आजाद को सलाह दे सकती थी कि श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस लेने की कार्रवाई न करें। इससे देश की बहुसंख्यक आबादी में जो मैसेज जाता वह अलग ही होता। आजाद सरकार का बलिदान लेकर कांग्रेस देश भर में सहानुभूति की लहर पर सवार हो जाती। तब भाजपा को कोई और मुद्दा ढूंढ़ना पड़ता।

वामपंथियों ने टेक्टीकल गलती यह की कि सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी को तो सार्वजनिक किया ही, उस पर अमल भी कर दिखाया। वे चाहते तो परमाणु करार मुद्दे को चुनावों तक वैसे ही घसीट सकते थे जैसा कि लंबे समय से कर रहे थे और सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल भाजपा को करने देते। अगर वामपंथी ऐसा कर देते तो देश को लेन-देन की उस गंदी राजनीति को नहीं भुगतना पड़ता जैसा कि वर्तमान में हो रहा है।

समर्थन वापसी को लेकर वामपंथी नेताओं में मतभेद न रहे हों ऐसा मानने के भी पर्याप्त कारण नहीं हैं। पूरे घटनाक्रम के दौरान सीताराम येचुरी की नई दिल्ली में अनुपस्थिति में कारणों को झांकने की कोशिश की जा सकती है। सारी उठापटक ‘देश हित’ के नाम पर ही हो रही है। ऐसे में ‘देश हित’ से बड़ा तो कोई काम लंदन में येचुरी के लिए निश्चित ही नहीं होना चाहिए था।

परमाणु करार से होने वाले फायदों का हिसाब तो आने वाली पीढ़ियां और सरकारें लगाएंगी पर इसको लेकर चल रही नौटंकी से जो क्षति देश की स्थिरता को हो रही है उसकी गणना तो तत्काल की ही जा सकती है। लाभ केवल एक व्यक्ति को निश्चित ही हुआ है और वे हैं डॉ. मनमोहन सिंह जो सरकार के गिर जाने की कीमत पर भी करार के पक्ष में अपनी जिद पूरी करवाने में सफल रहे। उन्होंने जापान में जाकर सिद्ध किया कि वे एक कमजोर प्रधानमंत्री नहीं हैं जैसा कि उनके बारे में भारत में प्रचार किया जाता रहा है।





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