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बड़े कुल के छींटें, उर्स का समापन

अजमेर. hajarat हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 796 वें उर्स का रविवार को बड़े कुल की रस्म की अदायगी के साथ ही समापन हो गया।

आशिकान-ए-ख्वाजा ने दरगाह की केवड़े और गुलाब जल से धुलाई कर रूहानी फैज हासिल किया। बड़े कुल की रस्म गाजे-बाजे के साथ अदा की गई। इसके बाद भी जायरीन का जुलूस के रूप में चादर लेकर आने का सिलसिला शाम तक रहा। रस्म पूरी होने के बाद जायरीन के लौटने का सिलसिला तेज हो गया।

अलसुबह से ही आशिकान-ए-ख्वाजा का सैलाब दरगाह में उमड़ने लगा। आठ बजे आस्ताना-ए-आलिया जायरीन के लिए मामूल कर दिया गया। यहां सिर्फ खुद्दाम मौजूद थे। खादिमों ने ख्वाजा साहब की मजार शरीफ को केवड़े और गुलाब जल से गुस्ल दिया। मजार शरीफ पर संदल चढ़ा इत्र का छिड़काव किया गया।

आस्ताने के बाहर जायरीन ने फज्र की नमाज के बाद से ही दर-ओ-दीवार, जालियों, खंभों और दरवाजों को धोना शुरू कर दिया। फर्श की केवड़े और गुलाब जल से भी धुलाई की। आस्ताना-ए-आलिया की दीवारों को धोने के बाद जायरीन पानी को बोतलों में भर कर ले गए। अरकाट का दालान, वजीर अली दालान, महफिल खाना और बुलंद दरवाजा के पास ढोल नगाड़े और शहनाई वादन के साथ जायरीन ने कुल की रस्म अदा की।

खासी तादाद में महिलाएं, युवतियां, बच्चे और बुजुर्ग भी कुल की रस्म में शामिल हुए। रस्म अदा होने के साथ ही बड़े पीर की पहाड़ी से तोप दागी गई और उर्स के समापन का ऐलान कर दिया गया।

जुलूसों का भी तांता लगा रहा
कुल की रस्म के बाद भी अकीदतमंद का दरगाह जियारत का सिलसिला जारी रहा। चिश्तिया कमेटी मुंबई के कार्यकर्ता जुलूस के रूप में चादर लेकर आए। खादिम सैयद हिमायत मोईनी की सदारत में निकले जुलूस में खासी तादाद में अकीदतमंद शरीक हुए। मोईनी ने उन्हें जियारत कराई, दस्तारबंदी की और तबरुक भेंट किया।

दरगाह बाजार खाली नजर आने लगा
कुल की रस्म की समाप्ति के बाद जायरीन के लौटने का सिलसिला तेज हो गया। दरगाह बाजार, अंदरकोट, खादिम मोहल्ला और लाखनकोटड़ी समेत विभिन्न मोहल्लों में ठहरे जायरीन सामान को ठेलों में भर कर रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड की ओर जाते नजर आए। शाम तक दरगाह क्षेत्र में जायरीन की गहमागहमी कम हो गई। दरगाह बाजार भी खाली नजर आने लगा।

उर्स का झंडा उतारा
अस्र की नमाज के बाद भीलवाड़ा के लाल मोहम्मद गौरी परिवार के सदस्यों ने बुलंद दरवाजे पर जमादिउस्सानी की 25 तारीख को चढ़ाया उर्स का झंडा पारंपरिक रस्मों के साथ उतार लिया।

तिरंगी चादर
बनारस से जायरीन का दल तिरंगी चादर लेकर पहुंचा। चादर को चूमने के लिए अकीदतमंद में होड़ लगी रही। खासी तादाद में महिलाएं और बच्चे भी जुलूस में शामिल थे। किन्नर भी चादर लेकर दरगाह पहुंचे। चादर चढ़ाने का सिलसिला आस्ताना शरीफ मामूल होने तक जारी रहा।





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