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स्पीकर की गरिमा का सवाल

संपादकीय. देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत के सभापति का पद एक ऐसा गरिमामयी पद है जिसे पार्टी राजनीति से ऊपर और सरकार से तटस्थ माना जाता है। यही वजह है कि स्पीकर के रूप में ऐसे व्यक्ति की खोज की परंपरा रही है जिसमें हर पार्टी के सांसद का भरोसा हो। इसीलिए प्राय: स्पीकर का चुनाव सर्वानुमति से और निर्विरोध होता आया है।

इस अर्थ में सोमनाथ चटर्जी माकपा जैसी कट्टर वैचारिक पार्टी का सदस्य होते हुए भी सबका भरोसा जीतने में भाग्यशाली रहे, लेकिन इसके बावजूद माकपा उन्हें स्पीकर से पहले पार्टी का एक सदस्य मानती है और चाहती है कि वे विश्वास मत से पहले इस्तीफा देकर पार्टी के अन्य सांसदों की तरह सरकार के विरुद्ध मतदान में हिस्सा लें।

चटर्जी अपने पद की गरिमा को देखते हुए ऐसा करने के अनिच्छुक हैं और संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने से लेकर दोबारा लोकसभा चुनाव न लड़ने तक का संकेत दे रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले लोकसभा सचिवालय से जारी स्पष्टीकरण में सोम दा की इच्छाओं का प्रतिबिंब देखा जा सकता था जिसमें कहा गया है कि स्पीकर किसी पार्टी की ओर से नामित नहीं किया जाता और एक बार इस पद पर निर्वाचित हो जाने के बाद वह न सिर्फ पार्टी राजनीति से ऊपर हो जाता है, बल्कि इससे अलग भी हो जाता है। लेकिन सरकार से समर्थन वापसी की अपनी चिट्ठी में पार्टी सांसद के तौर पर सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके माकपा ने यह साफ कर दिया है कि वह स्पीकर पद से उनका इस्तीफा करवा कर ही दम लेगी।

उसके लिए पार्टी और विचारधारा का सम्मान अन्य किसी भी चीज के सम्मान से ऊपर है। जिस पार्टी ने ज्योति बसु जैसे सर्वोच्च नेता को प्रधानमंत्री बनने की ‘ऐतिहासिक भूल’ करने की इच्छा को ठुकरा दिया हो और जिसने बी.टी.रणदिवे जैसे अपने भीष्म पितामह को पार्टी से निकाल बाहर करने में संकोच न किया हो उस पार्टी के लौह अनुशासन की अवहेलना चटर्जी पार्टी से निष्कासन का जोखिम उठाकर ही कर सकते हैं। हालांकि मत विभाजन में तुल्य बल होने की स्थिति में स्पीकर भी अपना निर्णायक वोट कर सकता है, लेकिन माकपा कोई उदारता दिखाने के मूड में नहीं लगती। माकपा नेता प्रकाश करात ने कहा जरूर है कि यह सोमनाथ चटर्जी पर निर्भर है कि वे क्या निर्णय लेते हैं, फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में लोकसभा के स्पीकर का पद किसी अनावश्यक विवाद में नहीं आएगा।





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