आलेख
इतने साल तक भारत में रहने के बाद मेरे मन में इस देश की महानता, असीम आध्यात्मिकता, यहां के लोग, उनका आतिथ्य-सत्कार, उनकी उदारता और खुलेपल के प्रति सम्मान का भाव है। यहां रहकर मैंने जाना कि यह देश बाकी देशों से कितना अलग है। यहां के हिंदुओं जैसे लोग आपको पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेंगे। यहां का मुसलमान सउदी अरब या ईरान के मुसलमान से जुदा है, या ईसाई भी फ्रेंच या अमेरिकी ईसाइयों से अलग हैं.. और इससे भी बड़ी बात इनकी यह दूसरों को स्वीकारने की भावना ही है जो भारत को अतुल्य देश बनाती है। उनकी यह भावना कि आप ईसाई हों या मुसलमान, श्वेतवर्णी हों या पीतवर्णी, फ्रेंच हों या मंगोलियाई; लेकिन ‘आप भी हमारी तरह इंसान हैं और इसीलिए हम आपको आपकी विविधताओं के साथ अंगीकार करते हैं।’
ऐसे में यह सवाल उठ सकता है कि यदि किसी देश के राजनेता वहां के लोगों की विशेषताओं को प्रतिबिंबित करते हैं, तो फिर ऐसा क्यों है कि भारत के राजनेता घटिया इंसान लगते हैं? ऐसा क्यों है कि जब हम भारत का राजनीतिक परिदृश्य देखते हैं तो हमें लगता है कि भारत के राजनेता इतने निचले स्तर तक कभी नहीं गिरे, और भारतीय राजनीति में नैतिकता का इतना क्षरण कभी नहीं हुआ और यह संभवत: कटुता, अवसरवाद, भ्रष्टाचार और गिरावट के अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच चुका है?
मिसाल के तौर पर अमरनाथ प्रकरण को ही लें। कश्मीर में एक खास समुदाय के लोग अपनी सरकार के खिलाफ दंगा-फसाद करने में लगे थे। उन्होंने कदापि यह नहीं सोचा उन्हें यहां कितने विशेषाधिकार हैं। हज यात्रा के लिए सरकार उन्हें जमीन और समर्पित अधिकारियों समेत तमाम तरह की सुविधाएं व रियायतें देती है। इसके बावजूद उनके द्वारा अपने हिंदू भाई-बंधुओं को बेहद कठिन चढ़ाई वाली जगह पर अपनी शारीरिक जरूरतों और आश्रय के लिए अस्थायी सुविधाएं देने पर इतनी हाय-तौबा क्यों मचाई गई?
यद्यपि सबसे भयावह बात यह है कि भारतीय प्रेस इन तथ्यों से भलीभांति अवगत है। वह जानती है कि मुलायम सिंह ने मायावती को फंसाने के लिए, या कुछ निर्धारित कानूनों पर जोर के जरिए अनिल अंबानी के कारोबार को फायदा देने के लिए कांग्रेस से समझौता किया है। मीडिया यह भी जानता है कि कांग्रेस विश्वासमत के लिए वाम व दक्षिणपंथी सांसदों की खरीद-फरोख्त में लगी है, संभवत: उस धन के जरिए जो अमेरिका से आया है।
ऐसे में फिर यह सवाल उठता है कि क्या इस देश के राजनेता और पत्रकार, जिसमें पहला पक्ष आसुरिक समझौते कर रहा है, और दूसरा इसे न देख पाने का दिखावा कर रहा है, क्या यही भारत का असली स्वभाव है? खैर, इसमें भारतीय राजनेताओं(या पत्रकारों) की कोई गलती नहीं है, इनमें से कई, कम से कम व्यक्तिगत तौर पर संवेदनशील और बुद्धिमान इंसान हैं और व्यक्तिगत तौर पर शायद वह न कहें तो वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं। यह सच है कि भारतीय राजनीति में ऐसे कई कारक हैं जो परोक्ष तौर पर इसकी साख को बट्टा लगाते हैं; एक है बड़ों का सम्मान करने की भावना जो भारत में एक बड़ी खूबी है और जिसे हमने पश्चिम में खो दिया है।
इस वजह से भारत में वयोवृद्ध राजनेताओं को जगह मिलती है। दूसरी है भक्ति की भावना, जिसे पश्चिम में ‘वंशवाद’ कहते हैं, जिसके तहत माना जाता है कि किसी तथाकथित महान राजनेता के पुत्र या पुत्री और यहां तक कि पत्नी में उसकी महानता के कुछ अंश आ जाते हैं और यही भावना नेहरु जैसे परिवारों को पिता से पुत्र, से नाती-पोते और पतोहू तक राज करने की इजाजत देती है, हालांकि इन सबमें नेहरु जैसे गुण नहीं हैं। तीसरी है शक्ति की भावना, या यह मान्यता कि महिलाओं में ईमानदारी, समर्पण और साहस की भावना अक्सर पुरुषों से ज्यादा होती है। इसी भावना ने इंदिरा गांधी जैसी महिला को देश पर तकरीबन बीस सालों तक एकछत्र राज्य करने की इजाजत दी और आज उनकी पुत्रवधू परोक्ष तौर पर देश का शासन चला रही है।
इसका मतलब है कि देश के लोगों में कोई खराबी नहीं है। यह तो सिर्फ नेहरु द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था है, जिसे अंग्रेजो से लिया गया और इसका भारतीयकरण किए बगैर स्थापित कर दिया गया। आज इसका दुरुपयोग हो रहा है। यह सच है कि इसे शुरुआत में इस विचारधारा के आधार पर स्थापित किया गया कि इसके जरिए अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटा जा सके, लेकिन पिछले साठ वर्र्षो में यह व्यवस्था इतनी विकृत हो गई कि आज लोकतंत्र के नाम पर अल्पमत सरकार खुलेआम ईमानदारी और मर्यादा जैसे मूल्यों को चिढ़ा रही है, जिसने लोगों का भरोसा खो दिया है, फिर भी देश के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाए जा रही है, इस तथ्य का लाभ लेते हुए कि भारत की बहुसंख्यक आबादी, जो हिंदू है, वह अपेक्षाकृत शांत है। वह आमतौर पर न तो दंगा-फसाद करते हैं और नहीं सड़कों पर उतरते हैं। वे विपरीत परिस्थितियों को देखकर भी शांत रहते हैं।
तो यदि व्यवस्था में खराबी है तो क्या किया जाए? निस्संदेह इसे बदल दिया जाए। लेकिन इसके लिए आपको तीन चीजें चाहिए- एक तो निश्चित सोच वाला ताकतवर नेता; दूसरा, एक मजबूत बहुमत ताकि संसद में सुधारवादी कानूनों को पारित करवाने के लिहाज से पर्याप्त संख्याबल हो; और तीसरा ऐसे संवैधानिक विशेषज्ञ जो भारतीय संविधान के कुछ बुनियादी सिद्धांतों को फिर से लिख सकें। मसलन इस संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति को कोई अधिकार नहीं है और जबकि ऐसा तंत्र होना चाहिए जिसमें ताकतवर राष्ट्रपति हो और बहुमत से प्रधानमंत्री का चुनाव हो।
समय-समय पर भारतमाता किसी ऐसे महान शख्स, योगी, अवतार या विभूति को जन्म देती है जो आता है और पूरे देश को आंदोलित कर देता है। यह सच है कि ज्यादातर समय ये आध्यात्मिक लोग ही रहे हैं जैसे आदि शंकराचार्य, कबीर, गुरुनानक या श्री अरविंदो। लेकिन क्या इस समय भारत में कुछ हद तक अध्यात्म से जुड़ा ऐसा भी कोई राजनेता होगा, जो इस भारत की महान भूमि की रक्षा करेगा? हम उम्मीद करें कि ऐसा हो, क्योंकि इस समय यह गंभीर संकट में है।
-लेखक पेरिस स्थित ‘ल रेव्यू द ल’इंड’ के प्रमुख संपादक हैं।