जयपुर यंगस्टर्स के पेरेंट्स यह सोचते हैं कि बच्चे टीवी देखकर कुछ नॉलेज गेन कर रहे हैं। भास्कर में दी गई न्यूज स्टोरी ‘बद्जुबानी की सीमा पार’ को पढ़ शहर के पेरेंट्स आगे आए। उनमें जबर्दस्त अग्रेशन था। सबके मन में एक ही सवाल था कि आखिर इन शोज का अस्तित्व क्यों और कैसे बना हुआ है? अगर यह हमारी सोसाइटी खासकर यंगस्टर्स पर बुरा असर डाल रहे हैं तो फिर क्यों यह टीवी चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं? क्या हम जेन-एक्स को यही सिखाना चाहते हैं? यह चैनल की टीआरपी बढ़ा रहे हैं।
पेरेंट्स का मानना है कि केवल एक शो ही नहीं बल्कि टीवी चैनलों पर रियलिटी शो, डेली सोप, काटरून, ऐड और कॉमेडी शो में जी भर कर अडल्ट कंटेंट, वेस्टर्न कल्चर और एक्सट्रीम वल्गैरिटी का तड़का लगाया जा रहा है।
जिम्मेदारी पेरेंट्स व मीडिया की
मीडिया की एक बड़ी जिम्मेदारी है। तिलक नगर निवासी एसोसिएट प्रोफेसर मिनी नंदा टीवी पर दिखाए जाने वाले रियल्टी शो के वल्गर कंटेंट को उचित नहीं मानतीं। अगर सीरियस कंसर्न वाले शो बनाए जाएंगे तो यंगस्टर्स उन्हें भी शौक से देखेंगे और कुछ अच्छा सीख पाएंगे। दिल्ली से एमए कर रही बेटी महीका को डिसीजन लेने की छूट है। पेरेंट्स के रोल में वे उसे किसी शो को न देखने की हिदायत देने के बजाय शो के बारे में डिस्कशन करना बेहतर मानती हैं। वे कहती हैं कि यंगस्टर्स को मना किया जाए तो हो सकता है वे क्यूरियस होकर छुपकर देखें। सच्चाई यही है ऐसे शो यंगस्टर्स के लिए सही नहीं हैं।
एग्रेसिव बना रहे हैं
फैशन डिजाइनर रीना भाटिया डबल मीनिंग जोक वाले लाफ्टर शो से नफरत करती हैं। उनका मानना है कि इनको देखकर यंगस्टर्स अग्रेसिव हो रहे हैं। इंडियन कल्चर तो जैसे खो रहा है। जब 13 साल की बेटी को इस तरह के शो को एंजॉय करते देखा तो काफी गुस्सा आया। उसे वॉर्न किया कि टीवी में ऐसे प्रोग्राम देखेगी तो केबल कनेक्शन कटवा देंगी। बच्चों को सही-गलत की पहचान नहीं होती। पेरेंट्स को ही ध्यान देना होता है कि वे टीवी पर क्या देख रहे हैं। दूसरा स्कूल और कॉलेजों में डिस्कशन के दौरान फ्रैंड्स से नए शो के बारे में जानने को मिलता है। सारे टाइम टीवी से चिपके रहते हैं। इस कारण ओबेसिटी और न्यूट्रीशन से जुड़ी प्रॉब्लम भी बढ़ रही हैं।
इमोशन से खेल रहा है टीवी
टीवी चैनलों पर यंगस्टर्स के लिए जो भी शो दिखाए जा रहे हैं वे उनके इमोशंस के साथ खेल रहे हैं। यह कहना है राजस्थान यूनिवर्सिटी के इंग्लिश डिपार्टमेंट की एचओडी प्रोफेसर सुधा राय का। वे कहती हैं कि आज-कल टीवी चैनलों पर वल्गैरिटी काफी लचीली बना दी गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि यंगस्टर्स पर इन शो का निगेटिव इम्पैक्ट हो रहा है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे अपशब्द और भद्दे कंटेंट दिखाने वाले शो को बच्चों के सामने नकारने की बजाय शो की वैल्यूज और स्टैंडर्ड पर चर्चा करें।
इससे बच्चे खुद शो में गलत दिखाए जाने वाले कंटेंट को समझ पाते हैं। प्रोफेसर मानती हैं कि चैनलों के लिए अलग से सेंसर बोर्ड होना चाहिए।
हमारी संस्कृति पर चोट
राजा पार्क के ऑटोमोबाइल डीलर मुकेश मुत्रिका सेंसर बोर्ड के रोल को लेकर काफी खफा हैं। वे कहते हैं, लगभग सभी चैनलों पर दिखाए जाने वाले प्रोग्रामों के कंटेंट को पूरी फैमिली साथ बैठकर नहीं देख सकती। वे मानते हैं कि फिल्में तो फिर भी कम संख्या में होती हैं, इतने चैनलों के हजारों सीरियलों के लिए सेंसर बोर्ड का एक्टिव रोल बहुत जरूरी है। यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि बेटियां टीवी पर इतने वाहियात शो देखकर कुछ गलत सीखें। हमारी संस्कृति पर होती चोट को गवर्नमेंट चुप-चाप देख रही है।
आप बताईए जिम्मेदार कौन?
भास्कर की कल की स्टोरी ‘बद्जुबानी की सीमा पार’ के बाद जयपुराइट्स आगे आए हैं कि आखिर टीवी पर दिखाए जाने वाले यूथ-ओरियंटेड प्रोग्राम क्यों इस भद्देपन के बाद भी दिखाए जा रहे हैं। आप सिटी भास्कर से शेयर करें कि किस तरह से यह शो यंगस्टर्स और सोसाइटी को नुकसान पहुंचा रहे हैं? क्या इन्हें चैनलों पर दिखाना सही है? आप अपने व्यू हमें ई-मेल कर सकते हैं- bhaskar_city@yahoo.co.in पर या फिर फोन कर सकते हैं- 3981205 पर दोपहर 12 से 2 बजे तक।