कोल्हापुर.दुनिया भर में चाहे महंगाई ने तहलका मचा रखा हो, लेकिन महाराष्ट्र की शेलकेवाडी इससे अछूती है। कई मामलों में गांधीजी के ग्राम स्वराज का सपना पूरा कर चुका यह गांव मूलभूत आवश्यकता की लगभग सभी चीजें खुद पैदा करता है।
आत्मनिर्भरता मूलमंत्र : कोल्हापुर जिले के इस गांव के ग्रामीण अपना खाद्यान्न खुद उगाते हैं, खाने का तेल बनाते है, डेयरी और बायोगैस प्लांट चलाते हैं। गांव में 67 परिवार रहते हैं और कुल जनसंख्या मात्र 367 है।
पुरस्कृत हुए प्रयास:
इस गांव को 2007 में निर्मल ग्राम अवॉर्ड और 2005-06 में यशवंत ग्राम पंचायत अवॉर्ड मिल चुका है। संत गाडगेबाबा ग्रामीण स्वच्छता अभियान में यह गांव दूसरे स्थान पर रहा था।
व्यसन नहीं: गांव में शराब, गुटखा और तंबाकू बेचना प्रतिबंधित है। साथ ही 2005 से पशु वध पर रोक लगा दी गई है। कानेरी के आध्यात्मिक गुरु कादसिदेश्वर महाराज की प्रेरणा से महिलाओं को अचल संपत्ति का अधिकार भी दिया गया है।
किसी भी चीज के लिए शहर के मोहताज नहीं हैं लोग
गांव के सरपंच और पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव किरण शेलके बताते हैं कि 90 एकड़ क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है, जिससे 32 लाख रुपए की वार्षिक आमदनी होती है, जबकि खरीफ के मौसम में ग्रामीण सोयाबीन, मूंगफली, चावल, मिर्च और अन्य फसलें उगाते हैं। रबी के मौसम में अन्य फसलों के साथ सूरजमुखी की खेती की बदौलत ग्रामीण 9,900 लीटर तेल का उत्पादन करते हैं। सरपंच के अनुसार कृषि कार्य से हर परिवार को औसतन 6,000 रुपए मासिक की आय हो जाती है।
गोबर गैस प्लांट के कारण यहां एलपीजी गैस की जरूरत ही नहीं होती। उपसरपंच दत्तात्रेय शेलके बताते हैं कि खेती के 70 फीसदी काम बैलों के जरिए पूरे होते हैं, तो सिंचाई राधानगरी बांध से होती है। सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में स्थित होने के कारण गांव में पर्याप्त वर्षा होती है और जल वितरण की सहकारी व्यवस्था के कारण सिंचाई का शुल्क 2,000 रुपए प्रतिवर्ष है, जबकि अन्य गांवों में किसान इसके लिए 9,000 रुपए प्रतिवर्ष चुकाते हैं।