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महंगाई और सिनेमा

परदे के पीछे.किसी भी सुपर सितारे को दूध, सब्जी या पेट्रोल के दाम नहीं मालूम। आटे-दाल के भाव से अनभिज्ञ रहने का अर्थ है कि आप आम आदमी से बहुत दूर जा चुके हैं। हिंदुस्तान के लगभग 15 प्रतिशत लोग ऐसे ऊंचे आर्थिक स्तर पर पहुंच चुके हैं कि उन्हें महंगाई का अर्थ ही नहीं मालूम। नेताओं को प्याज के दाम उस समय मालूम होते हैं जब चुनाव हारने पर आंसू बहने लगते हैं। विगत कुछ समय में दुनिया के सभी देशों में महंगाई की मार आम आदमी झेल रहे हैं परंतु हर देश में महंगाई का असर उस देश के विराट आर्थिक ढांचे पर निर्भर करता है।

अमेरिका में आम आदमी के लिए महंगाई का अर्थ है कि सप्ताह में पांच की जगह केवल एक बार महंगे होटल में भोजन करना और बड़ी कार के बदले छोटी कार में दफ्तर जाना या साल में दो बार के बदले एक बार विदेश में छुट्टी मनाना या क्रिसमस पर पांच किलो के केक के बदले एक किलो का केक खाना। भारत में महंगाई का अर्थ है दाल के बिना रोटी खाना। भारत में जबरदस्त आर्थिक खाई है। यहां का अमीर वर्ग भी अमेरिका की तरह केक छोटा कर सकता है, परंतु गरीब वर्ग को अभाव का दुरूह जीवन ढोना पड़ता है।

अमेरिका ने नौ साल पहले ऐसा आर्थिक आधार खड़ा किया है कि महंगाई की मार पेट पर नहीं पड़ती। हमने आर्थिक खाई खोदी है जिसके कुछ एक लोगों को फर्क नहीं पड़ता परंतु दूसरी ओर कयामत टूट पड़ती है। बहरहाल फिल्म उद्योग में अमीरों का प्रतिशत कम है और शेष तकनीशियनों को महंगाई झेलना पड़ रही है। आज भारतीय सिनेमा उद्योग में एक भी ऐसा फिल्मकार नहीं है जो महंगाई पर फिल्म बना सके। दरअसल आज के मनोरंजन उद्योग ने आम आदमी को ही बतौर नायक खारिज कर दिया है।

आज का सिनेमा शो दर शो, फिल्म दर फिल्म गैर भारतीय होता जा रहा है। और सच तो यह है कि हर भारतीय को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह कितने प्रतिशत भारतीय रह गया है। यहां भारतीय का अर्थ कूपमंडूकता या व्यर्थ के रीति-रिवाज नहीं, वरन सोचने का तरीका है। पांचवें दशक में बलराज साहनी अभिनीत ‘गरम कोट’ बनी थी जिसमें वेतन गुम जाने पर परिवार की हालत का वर्णन था और खुदकुशी करने के पहले नायक अपना गरम कोट भिखारी को देने लगता है। फटे हुए अस्तर में गुमा हुआ पर्स मिल जाता है। मेहबूब खान की ‘आवाज’ राजकपूर की ‘बूट पालिश’ भी कुछ ऐसी ही मार्मिक फिल्में थीं। काश ऐसे फिल्मकार आज होते।





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Ravi Dashore
Friday, 18th Jul 2008, 11:20
This is a article which should be read by every Indian, and I want say to Shri Jaiprakash sir, there is a lot of film-maker who can make a film like 'Boot pilish' or 'Garam Koat', but if they write a such type of script, no body will ready to produce it because in the AC room of production house you can find a persons who have hold a management degree but no one, who can understand the script and some good filmmaker and producer doesn't want meet with 'Aam Aadmi' it doesn't matter whether he has good script or not ,.......why??