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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur मलकानगिरी.
नक्सलियों द्वारा पुलिस वाहन को उड़ाने के लिए इस्तेमाल विस्फोटक की ताकत देख पुलिस के आला अफसर भी भौचक हैं। धमाके में करीब 40 टन वजनी एंटी लैंड माइन व्हीकल किसी छोटी जीप की तरह 20-25 फुट दूर जा गिरा था। वाहन में बैठे सभी 17 जवान शहीद हो गए।
बुधवार रात तक माना जा रहा था कि वाहन में 24 जवान बैठे थे, जिसमें से कोई जिंदा नहीं बचा। तीन साल पहले बीजापुर-गंगालूर मार्ग पर नक्सलियों ने ऐसे ही एक एंटी लैंड माइन व्हीकल को उड़ाया था, लेकिन बुधवार की वारदात में इस्तेमाल विस्फोटक कहीं ज्यादा शक्तिशाली था।
भाजपा नेता सुबल बल के घर हमले की जांच करने यहां से निकला स्पेशल आपरेशन ग्रुप का दस्ता कोंटा-कालीमेला मार्ग पर जाते समय विस्फोटकों का पता लगाने वाले उपकरणों से पुलिया समेत पूरे रास्ते की जांच करता हुआ गया था। शाम 4.30 बजे लौटते समय उसने दुबारा जांच नहीं की। यही चूक भारी पड़ गई। फोर्स लौटने के पहले घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने पुलिया के नीचे विस्फोटकों से भरा ड्रम रख दिया। नक्सलियों ने ड्रम में सौ किलो से ज्यादा विस्फोट भरा था। जैसे ही वाहन पुलिया के ऊपर पहुंचा कुछ दूर छिपे बैठे नक्सलियों ने विस्फोट कर दिया।
विस्फोट ठीक गाड़ी के नीचे हुआ और एंटी लैंड माइन व्हीकल 20 फुट तक उछलकर दूर पेड़ों के बीच जा गिरा। शक्तिशाली धमाके से वाहन बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुआ। उसके चक्के और कलपुर्जे आसपास बिखर गए। कांक्रीट के स्ट्रक्चर वाली पुलिया भी ध्वस्त हो गई है। स्टील की मोटी चादरों से बने एंटी लैंड माइन वाहन पर साधारण फायरिंग को तो कोई असर ही नहीं होता।
25 किलो तक के विस्फोटक और ग्रेनेड हमले को वाहन झेल जाता है। नक्सलियों द्वारा उपयोग किए गए विस्फोटक की किस्म की पड़ताल हो रही है। पिछले 48 घंटों की परिस्थिति को देखते हुए पुलिस को शक है कि नक्सलियों ने वारदात की तैयारी कम से कम हफ्ते भर पहले से कर रखी थी। इसमें मिलिटरी दलम के सदस्यों का हाथ होने की संभावना है, जो इस तरह से सटीक विस्फोट करने में विशेषज्ञ माने जाते हैं। वजनी होने के कारण इस वाहन की रफ्तार सामान्य गाड़ियों से कुछ कम होती है। इसका भी नक्सलियों को लाभ मिला। घटनास्थल से पुलिस ने पांच जिंदा पेट्रोल बम भी बरामद किए। इनका नक्सली क्या इस्तेमाल करने वाले थे, पुलिस समझ नहीं पाई है।
बुधवार आधी रात तक यही माना जा रहा था कि वाहन में 24 लोग थे। बाद में पता चला कि अंदर जगह कम पड़ने की वजह से बाकी जवान मोटरसाइकिलों से लौट रहे थे। गाड़ी में फंसे 17 जवानों के शवों को निकालने में पुलिस को आठ घंटे से ज्यादा का समय लगा।
मलकानगिरी से जनरेटर लेकर निकली पुलिस पार्टी ने गैस कटर की मदद से वाहन की बाडी को काटकर जवानों के शवों को निकाला। ज्यादातर जवानों की मौत सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में लगी घातक चोटों से हुई। शहीद जवानों के शवों को लेकर गुरुवार तड़के 5 बजे पुलिस वाहन मलकानगिरी पहुंचा। जहां से शवों को उनके गृहग्राम रवाना कर दिया गया।
शवों को भेजने के लिए हेलिकाप्टर का इंतजाम नहीं किया जाने से उड़ीसा पुलिस यूनियन के पदाधिकारी बिफरे हुए हैं। उनका कहना है कि कुछ जवान 6-7 सौ किमी दूर रहने वाले थे। घर पहुंचते-पहुंचते शव सड़ने लगेंगे। उनका आरोप है कि जवानों को भेजते समय न्यूनतम सुरक्षा मापदंडों का पालन नहीं किया गया।
इलाका सीआरपीएफ के हवाले
बारूदी सुरंग विस्फोट में 17 जवानों की शहादत के बाद उड़ीसा पुलिस ने पूरे इलाके को सीआरपीएफ के हवाले कर दिया है। इस बल की दो बटालियनों के जवान जंगल में फैल गए है और नक्सलियों की तलाश शुरू हो गई है। इस फोर्स को जंगल वारफेयर की खास ट्रेनिंग मिली है।
20 दिन के अंदर हुए दूसरे बड़े हमले की जांच करने राज्य शासन ने आला पुलिस अफसरों के दल को मलकानगिरी भेजा है, जिसमें जिले में एसपी रह चुके हिमांशु लाल शामिल हैं। राज्य के डीजीपी गोपालकृष्ण नंद शुक्रवार को मलकानगिरी पहुंच रहे हैं। शहीद जवानों के परिजनों को उड़ीसा सरकार ने 14 लाख रुपए की आर्थिक सहायता और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है।
जगह-जगह चूक
पिछले महीने आंध्र की ग्रेहाउंड्स फोर्स पर हुए हमले के बावजूद उड़ीसा पुलिस ने कोई सीख नहीं ली। फोर्स को नकक्ली इलाकों में छोटे समूह में चलने को कहा जाता है, ताकि हमला होने पर नुकसान कम से कम हो। उसी रास्ते से लौटने की भी सख्त मनाही होती है। मजबूरी हो तो अतिरिक्त एहतियात बरतने के निर्देश होते हैं। इलाके में नक्सलियों की मौजूदगी की स्थिति में केवल 40 जवानों को भेजा जाना भी जोखिम भरा फैसला था।