HomeNewsMetrosIndore Indore

जेल के डर से जिंदगी दांव पर लगा दी

इंदौर. सैकड़ों की भीड़ हम पर टूट पड़ी। उपद्रवी हमारी ओर लगातार हमले कर रहे थे और जान लेने पर उतारू थे लेकिन क्या करते हम? जमकर डंडे, गोलियां चलाते तो सस्पैंड होते और हत्या का केस दर्ज हो जाता। लड़ रहे थे मैदान में और डर जेल का। इसी कश्मकश का नतीजा सामने है। तीन हड्डियां टूट गई है और अब बैठ भी नहीं सकता। ऐसा कहते-कहते उनकी आंखें डबडबा गई।

यह पीड़ा है विशेष सशस्त्र बल पहली बटालियन के आरक्षक क्षमाकांत पाठक की, जो एमवाय अस्पताल की दूसरी मंजिल पर भर्ती है। चार दिन पहले रमेश निनामा हत्याकांड के बाद खुर्दी में स्थिति बिगड़ी तो उनकी कंपनी वहां भेजी गई। उन्होंने बताया शुरू में हाईवे पर जाम लगा था और तनाव भी था। उससे जैसे-तैसे निपटे तो इधर-उधर से उपद्रव की सूचना आती रही और हम दौड़ते रहे। फिर खुर्दी में पथराव, तोड़फोड़ और आगजनी होने लगी। उपद्रवी सैकड़ों थे और काफी समझाने के बाद भी काबू में नहीं आ रहे थे। एक बार खदेड़ा तो और ज्यादा तादाद में आए और पथराव करने लगे।

इस बीच कुछ उपद्रवी डंडे, लाठियां और हथियार लेकर आए और हम 8-10 पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया। हम बार-बार उन्हें खदेड़ते लेकिन वे फिर हमला कर देते। हमारे पास के सारे आंसू गैस के गोले फेंकदिए। कुछ फूटे और कुछ बारिश के कारण बेकार हो गए। इसके बाद तो उन्होंने सीधा हमला कर दिया। जवाब में जिला पुलिस के दो कर्मियों ने हवाई फायर किए। उनकी गोलियां भी खत्म हो गई। फिर तो बचना मुश्किल हो गया।

इस बीच एसडीओपी धनंजय शाह की गाड़ी आई। हम उसमें सवार होने लगे, तो उपद्रवी लाठियां बरसाने लगे। मैं जैसे-तैसे गाड़ी पर लटकता हुआ कुछ दूर जाकर गिरा और बेहोश हो गया। अस्पताल में ऑपरेशन के बाद होश आने पर पता चला कमर के नीचे की हिस्से की तीन हड्डियां टूट गई हैं और रॉड डालना पड़ी। अब मैं खड़ा होना तो दूर बैठ भी नहीं सकता। सारी दिनचर्या बच्चों पर ही निर्भर है। बार-बार मन में वही दृश्य कौंधता है कि कोई ठोस एक्शन लेते तो सस्पेंड होने के साथ हत्या के मामले में जेल जाना पड़ता और बच्चे..। कोई एक्शन नहीं ली तो नतीजा सामने है।

पुलिसकर्मियों पर हत्या का केस दर्जकरने से उपजा क्षमाकांत का दर्द
क्षमाकांत व अन्य पुलिसकर्मियों की बातों से पता चला पिछले दिनों जूना रिसाला में फायरिंग के बाद तीन पुलिसकर्मियों पर हत्या का केस दर्ज करने से सभी का मनोबल गिरा है। विकट स्थिति में भी वे उपद्रवियों पर ठोस एक्शन को तैयार नहीं। मैदान में मोर्चा भले ही संभालें, मन में वर्दी का जोश नहीं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

आपके विचार