हमारे यहां गुरु को ही ब्रम्हा, गुरु को ही विष्णु, गुरु को ही शिव और गुरु को ही साक्षात् परब्रम्हा माना गया है। जीवन में किसी पर श्रद्धा हो, किसी पर भी पूर्ण विश्वास हो तो बस बेड़ा पार ही समझिए। किसी के वचन को मानने की इच्छा हो, आज्ञापालन की दृढ़ता हो तो उसके लिए जीवन में कौन सा काम दुर्लभ है। सबसे अधिक श्रद्धेय, सबसे अधिक विश्वसनीय, सबसे अधिक प्रमास्पद श्री सद्गुरु ही हैं, जो निरंतर शिष्य का अज्ञान दूर करने के लिए मन से चेष्टा करते रहते हैं।
एक गुरु भक्त थे, त्नउपमन्युत्न। ये महर्षि आयोदधौम्य के शिष्य थे। गुरु ने इन्हें गायें चराने का कार्य दे रखा था। वे दिनभर जंगल में गायें चराते, रात्रि में गुरु घर लौट आते। एक दिन गुरु ने उन्हें खूब हृष्ट-पुष्ट देखकर पूछा-त्नबेटा उपमन्यु! हम तुम्हें खाने को तो देते नहीं, तुम इतना हृष्ट-पुष्ट कैसे हो।त्न उपमन्यु ने कहा-त्नभगवन्! मैं भिक्षा मांगकर अपने शरीर का निर्वाह करता हूं।त्न गुरु ने कहा-त्नबेटा! बिना गुरु को अर्पण किए भिक्षा को पा लेना पाप है, अत: जो भी भिक्षा मिले, उसे पहले मुझे अर्पण किया करो। मैं दूं तब तुम्हें खाना चाहिए।त्न
त्नबहुत अच्छात्न कहकर शिष्य ने गुरु की आज्ञा मान ली और वह प्रतिदिन भिक्षा लाकर गुरु को अर्पण करने लगा। गुरु तो उसकी परीक्षा ले रहे थे, उसे कसौटी पर कस रहे थे, अग्नि में तपाकर कुंदन बना रहे थे। उपमन्यु जो भिक्षा लाते, गुरुजी उसे पूरी की पूरी रख लेते, उन्हें खाने के लिए कुछ भी नहीं देते। कुछ दिनों बाद गुरु ने देखा उपमन्यु तो पहले की ही भांति हृष्ट-पुष्ट है, तब उन्होंने कहा-त्नबेटा उपमन्यु! तुम आजकल क्या खाते हो।त्न उपमन्यु ने कहा-त्नभगवन्! पहली भिक्षा मांगकर मैं आपको अर्पण कर देता हूं। फिर दुबारा जाकर भिक्षा मांग लाता हूं, उसी पर अपना निर्वाह करता हूं।त्न
गुरु ने कहा-त्नयह भिक्षा धर्म के विरुद्ध है, इससे गृहस्थों पर भी बोझा पड़ेगा और दूसरे भिक्षा मांगने वालों को भी संकोच होगा। अत: आज से दुबारा भिक्षा मत मांगना।त्न शिष्य ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की और दूसरी बार भिक्षा मांगना छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद गुरु ने फिर उपमन्यु को ज्यों का त्यों देखकर पूछा-त्नउपमन्यु! अब तुम क्या खाते हो।त्न उपमन्यु ने कहा-त्नमैंने दुबारा भिक्षा लाना छोड़ दिया है, मैं अब केवल गायों का दूध पीकर रहता हूं।त्न गुरु ने कहा-त्नयह तुम बड़ा अनर्थ कर रहे हो, मेरे बिना पूछे गायों का दूध कभी नहीं पीना चाहिए। आज से गायों का दूध मत पीना।त्न
शिष्य ने गुरु की यह बात मान ली और उसने गायों का दूध भी पीना छोड़ दिया। थोड़े दिनों बाद गुरु ने फिर उपमन्यु को हृष्ट-पुष्ट देखा और पूछा-त्नबेटा! तुम दुबारा भिक्षा भी नहीं लाते, गायों का दूध भी नहीं पीते, फिर भी तुम्हारा शरीर ज्यों का त्यों बना है, तुम क्या खाते हो।त्न उसने कहा-त्नभगवन्! मैं बछड़ों के मुख में से गिरने वाले फेन को पीकर अपनी वृत्ति चलाता हूं।त्न गुरु ने कहा-त्नदेखो, यह तुम ठीक नहीं करते। बछड़े दयावश तुम्हारे लिए अधिक फेन गिरा देते होंगे। इससे वे भूखे रह जाते होंगे। तुम बछड़ों का फेन भी मत पिया करो। उपमन्यु ने इसे भी स्वीकार कर लिया और उस दिन से फेन पीना भी छोड़ दिया।
अब वे उपवास करने लगे। प्रतिदिन उपवास करते और दिनभर गायों के पीछे घूमते। भूखे रहते-रहते उनकी सब इंद्रियां शिथिल पड़ र्गइ। भूख के वेग में वे बहुत से आक के पत्तों को खा गए। उन कड़वे, विषैले पत्तों को खाने से उनकी आंखें फूट र्गइ। फिर भी उन्हें गायों के पीछे तो जाना ही था, वे धीरे-धीरे आवाज के सहारे गायों के पीछे चलने लगे। आगे एक कुआं था, वे उसी में गिर पड़े।
गुरु उनके साथ निर्दयता के कारण ऐसा बर्ताव नहीं करते थे, वे तो उसे पक्का बनाना चाहते थे। इसीलिए ऊपर से तो गुरुजी ऐसा बर्ताव करते थे, भीतर से सदा उन्हें उपमन्यु की चिंता लगी रहती थी। रात्रि में जब उपमन्यु नहीं आए, तब उन्होंने अपने दूसरे शिष्य से कहा-चलो, उसे जंगल में चलकर ढूंढ़ें।त्न सर्वत्र वे जोर से आवाज देते-त्नबेटा उपमन्यु! तुम कहां हो। जल्दी आओ।त्न
कुएं में पड़े हुए उपमन्यु ने गुरु की आवाज सुन ली। उसने वहीं से जोर से कहा-त्नगुरुजी! मैं यहां कुएं में पड़ा हूं।त्न गुरुजी वहां पहुंचे और बोले-त्नबेटा! ऋग्वेद की ऋचाओं से तुम देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों की स्तुति करो, वे तुम्हें आंखें दे देंगे।त्न उसने वैसा ही किया। स्वर के साथ वैदिक ऋचाओं से अश्विनी कुमारों की प्रार्थना की। उससे प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों ने उसकी आंखें अच्छी कर दीं और उसे एक पूआ देकर कहा कि त्नइसे तुम खा लो।त्न
उसने कहा-त्नदेवताओ! मैं अपने गुरु को बिना अर्पण किए इस पूआ को कभी नहीं खा सकता।त्न तब अश्विनी कुमारों ने उसे सब विद्याओं के स्फूरित होने का आशीर्वाद दिया। बाहर आने पर गुरु ने भी उन्हें छाती से लगाया और देवाताओं के आशीर्वाद का अनुमोदन किया। कालांतर में उपमन्यु भी आचार्य हुए। वे गुरुकुल के कष्ट को जानते थे अत: अपने किसी शिष्य से कोई काम नहीं लेते थे, सबको प्रेमपूर्वक पढ़ाते थे।