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करार के बाद भी जोखिम कम नहीं

दृष्टिकोण. nuclear हमारा देश जल्द ही बहुप्रतीक्षित 123 परमाणु करार पर आगे कदम बढ़ाएगा, लेकिन क्या हम राजनीतिक जुमलेबाजियों से परे इस करार की उलझनों को समझते हैं? करार हो जाएगा, लेकिन उसके बाद क्या? शायद इस समय लोगों का इस बात पर सबसे कम ध्यान है कि किसी अनचाही परमाणु दुर्घटना से कितनी तबाही हो सकती है। क्या देश की जनता और सरकारी एजेंसियां परमाणु आपदाओं के प्रभाव या नतीजों के लिए तैयार हैं?

सक्रिय और विवेकपूर्ण प्रयासों के जरिये यह सुनिश्चित हो सकता है कि देश के नागरिक और स्थानीय निकाय इसके लिए अच्छी तरह से तैयार हो जाएं, लेकिन इसके लिए सार्वजनिक बहस और प्रतिबद्धता की जरूरत है। यद्यपि इस संबंध में कदाचित ही कोई बहस हुई हो कि परमाणु शक्ति के साथ जो खतर आते हैं, उनसे हम खुद को कैसे बचाए रख सकते हैं। परमाणु आपदा इतना गंभीर मसला है कि इसे नागरिकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जनता को भी यही बात सरकार से कहनी चाहिए। असलियत यह है कि दोनों को संयुक्त रूप से तैयारी करनी होगी।

पहली और सबसे जरूरी बात, नागरिकों को परमाणु आपदा के खतरे से जुड़ी बुनियादी बातों को समझना होगा। हमार देशवासी, यहां तक कि शिक्षित मध्यवर्गीय शहरी भी इन बुनियादी बातों को नहीं जानते। इससे दूसर पक्ष के लिए ही नहीं, वरन परमाणु शक्ति-संपन्न देशों के सभी नागरिकों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा होता है। इस लिहाज से जनता को परमाणु शक्ति के प्रभाव के बारे में शिक्षित करने के लिए स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया और सरकार को महती भूमिका निभानी होगी।

दूसरी बात, जैसे परमाणु ऊर्जा से जुड़े संस्थागत ढांचों का निर्माण किया जाता है या उन्हें आकार दिया जाता है, जनता को इस बात पर भी जरूर बहस करनी चाहिए कि देश किस तरह परमाणु आपदा के खतरे को घटाने के प्रयासों को संस्थागत रूप दे सकता है। क्या भारत की परमाणु नीतियों, कूटनीतियों, भौगोलिक व आंचलिक योजनाओं, कार्यक्रमों व प्रस्तावित परियोजनाओं पर सार्वजनिक बहस होती है?

परमाणु सुरक्षा के लिए जनता को जानकार होना चाहिए ताकि वह संबंधित संस्थानों को इसके प्रति जवाबदेह बना सके। 26 मई 1986 को हुआ चेर्नाेबाइल परमाणु हादसा सुरक्षा मानकों की लगातार अनदेखी किए जाने का नतीजा था। यदि जनता को इसके खतरों के बार में पता होता तो संभवत: सुरक्षा मानक बेहतर होते और यह हादसा नहीं होता। नागरिकों को सुरक्षा मानकों संबंधी जानकारी और प्रगति के आंकड़े मंगाने के लिए सूचना का अधिकार कानून की प्रक्रिया का इस्तेमाल करना होगा।

तीसरी, परमाणु खतरे को कम करना महंगा है। यद्यपि कोयले के चलते पर्यावरण को जो कीमत चुकानी पड़ती है, यह उसके मुकाबले काफी कम है लेकिन फिर भी परमाणु खतरे को कम करने हेतु वित्त-पोषण के लिए अग्रिम रूप से पूंजी की जरूरत होगी। सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं बताया कि इन लागतों को कौन पूरा करेगा? आखिर यह कैसे और किस समझौते के तहत हो पाएगा? क्या इस लागत को नागरिकों में या इसका इस्तेमाल करने वाले लोगों में बिजली के बिल के जरिये समान रूप से बांट दिया जाना चाहिए? एक वांछनीय विकल्प तो यह हो सकता है कि व्यावसायिक बीमे का प्रावधान हो, जहां किसी बीमांकक द्वारा प्रीमियम इस आधार पर तय किया जाए इससे किसको किस हद तक खतरा है।

चौथी, भारत ऐसी तकनीक कैसे चुनेगा जो जोखिम को कम करे? निश्चित ही विशेषज्ञ इस बारे में कुछ कहेंगे और आपूर्ति करने वाली फम्र्स सरकार के प्रमुख अनुबंध हासिल करने के लिए अपने उत्पादों को आक्रामक तरीके से प्रमोट करेंगी। यदि खुले बाजार की सौदेबाजी की प्रक्रिया अपनाई जाती तो अनुबंधों को गुणवत्ता और सुरक्षा के हिसाब से कीमत के आधार पर तय किया जाता।

परंतु सरकारी खरीद प्रणाली में दूसरे कारक भी शामिल हो सकते हैं, जो निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि प्राधिकारी इस वर्ष कर्ज, पुनर्भुगतान, मुद्रास्फीति और खाद्य वस्तुओं की महंगाई और तेल सब्सिडी के चलते कई स्तरों पर बजट में कमी को देखते हुए अपेक्षाकृत सस्ती तकनीक को अपनाने का निर्णय लेते हैं तो भारत को पुराने उपकरणों व तकनीकों, जिनके जोखिम के बारे में सब जानते हैं, का वैश्विक कबाड़खाना बन जाने का खतरा है।

पांचवीं, बड़ी संख्या में परमाणु पावर प्लांट्स के विकल्प जल्द ही खड़े होंगे और स्वीकृति के लिए परियोजनाएं-दर-परियोजनाएं कतार में होंगी। इन परियोजनाओं की असुरक्षा और जोखिम के निर्धारणों का अंकेक्षण कैसे होगा? राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जल्द ही ऐसे दिशा-निर्देश बनाएगा। क्या यह काफी होगा? क्या ऐसे दिशा-निर्देशों से अतीत में मदद मिली है? क्या यह प्रक्रिया सरकारी अधिकारक्षेत्र में बनी रहेगी? सुरक्षा में सुधार के लिए इन प्रक्रियाओं और मानकों की पारदर्शिता बरकरार रखनी चाहिए।

छठी, परमाणु खतरे को कम करना किसी एक एजेंसी का एजेंडा नहीं हो सकता। इसके लिए व्यापक पैमाने पर लोक व निजी सहभागिता जरूरी है, जो बेहतर प्रशासन, प्राइवेट सेक्टर के जुड़ाव, सैन्य तत्परता और यहां तक कि क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर गौर करने की मांग करती है। ज्यादातर एजेंडा सार्वजनिक प्राधिकरणों व विशेषज्ञ समितियों द्वारा ही तय किए जाएंगे। हालांकि, विश्वव्यापी अनुभव बताता है कि रडियोधर्मी पदार्थ के रिसाव या इस शक्ति के दुरुपयोग की चेतावनी अक्सर किसी नागरिक या जनसमूह द्वारा दी जाती है। नागरिक समाज को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि ऐसे खतरों की चेतावनी देने का मार्ग हमेशा खुला रहे।

सातवीं, भारत को इन परमाणु गतिविधियों की सुरक्षा के अलावा उच्च मानकों व जवाबदेही को प्रवर्तित करने के लिए नवीनीकृत नेशनल लीगल फ्रेमवर्क की जरूरत होगी। कौन इस सुरक्षा ढांचे व मानकों को तैयार और प्रवर्तित करेगा? सरकार को साधारण शर्ते पर यह जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए। नागरिकों और समाज को सेफ्टी व रिकवरी ब्लूप्रिंट्स की तैयारी के लिए एक और त्रासदी का इंतजार नहीं करना चाहिए।

उन्हें भोपाल गैस त्रासदी से सबक लेना चाहिए जिसमें मुआवजे के लिए दशकों से कानूनी प्रक्रिया, मुकदमेबाजी और संघर्ष चल रहा है। नागरिकों को एक समुचित नया फ्रेमवर्क स्थापित करने के लिए सक्रिय रूप से अपने संसदीय प्रतिनिधियों के साथ काम करना चाहिए। वास्तविक जोखिम के पुख्ता समाधान से जुड़े इन सवालों के जवाब देने के लिए राजनेताओं को भी तैयार रहना चाहिए। - लेखक एशिया में बदलते जोखिम परिदृश्य पर काम कर रहे हैं।करार के बाद भी जोखिम कम नहीं

द्द मिहिर आर भट्ट

दृष्टिकोण संदर्भ : परमाणु शक्ति

हमारा देश जल्द ही बहुप्रतीक्षित 123 परमाणु करार पर आगे कदम बढ़ाएगा, लेकिन क्या हम राजनीतिक जुमलेबाजियों से परे इस करार की उलझनों को समझते हैं? करार हो जाएगा, लेकिन उसके बाद क्या? शायद इस समय लोगों का इस बात पर सबसे कम ध्यान है कि किसी अनचाही परमाणु दुर्घटना से कितनी तबाही हो सकती है। क्या देश की जनता और सरकारी एजेंसियां परमाणु आपदाओं के प्रभाव या नतीजों के लिए तैयार हैं?

सक्रिय और विवेकपूर्ण प्रयासों के जरिये यह सुनिश्चित हो सकता है कि देश के नागरिक और स्थानीय निकाय इसके लिए अच्छी तरह से तैयार हो जाएं, लेकिन इसके लिए सार्वजनिक बहस और प्रतिबद्धता की जरूरत है। यद्यपि इस संबंध में कदाचित ही कोई बहस हुई हो कि परमाणु शक्ति के साथ जो खतर आते हैं, उनसे हम खुद को कैसे बचाए रख सकते हैं। परमाणु आपदा इतना गंभीर मसला है कि इसे नागरिकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जनता को भी यही बात सरकार से कहनी चाहिए। असलियत यह है कि दोनों को संयुक्त रूप से तैयारी करनी होगी।

पहली और सबसे जरूरी बात, नागरिकों को परमाणु आपदा के खतरे से जुड़ी बुनियादी बातों को समझना होगा। हमार देशवासी, यहां तक कि शिक्षित मध्यवर्गीय शहरी भी इन बुनियादी बातों को नहीं जानते। इससे दूसर पक्ष के लिए ही नहीं, वरन परमाणु शक्ति-संपन्न देशों के सभी नागरिकों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा होता है। इस लिहाज से जनता को परमाणु शक्ति के प्रभाव के बारे में शिक्षित करने के लिए स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया और सरकार को महती भूमिका निभानी होगी।

दूसरी बात, जैसे परमाणु ऊर्जा से जुड़े संस्थागत ढांचों का निर्माण किया जाता है या उन्हें आकार दिया जाता है, जनता को इस बात पर भी जरूर बहस करनी चाहिए कि देश किस तरह परमाणु आपदा के खतरे को घटाने के प्रयासों को संस्थागत रूप दे सकता है। क्या भारत की परमाणु नीतियों, कूटनीतियों, भौगोलिक व आंचलिक योजनाओं, कार्यक्रमों व प्रस्तावित परियोजनाओं पर सार्वजनिक बहस होती है?

परमाणु सुरक्षा के लिए जनता को जानकार होना चाहिए ताकि वह संबंधित संस्थानों को इसके प्रति जवाबदेह बना सके। 26 मई 1986 को हुआ चेर्नाेबाइल परमाणु हादसा सुरक्षा मानकों की लगातार अनदेखी किए जाने का नतीजा था। यदि जनता को इसके खतरों के बार में पता होता तो संभवत: सुरक्षा मानक बेहतर होते और यह हादसा नहीं होता। नागरिकों को सुरक्षा मानकों संबंधी जानकारी और प्रगति के आंकड़े मंगाने के लिए सूचना का अधिकार कानून की प्रक्रिया का इस्तेमाल करना होगा।

तीसरी, परमाणु खतरे को कम करना महंगा है। यद्यपि कोयले के चलते पर्यावरण को जो कीमत चुकानी पड़ती है, यह उसके मुकाबले काफी कम है लेकिन फिर भी परमाणु खतरे को कम करने हेतु वित्त-पोषण के लिए अग्रिम रूप से पूंजी की जरूरत होगी। सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं बताया कि इन लागतों को कौन पूरा करेगा? आखिर यह कैसे और किस समझौते के तहत हो पाएगा? क्या इस लागत को नागरिकों में या इसका इस्तेमाल करने वाले लोगों में बिजली के बिल के जरिये समान रूप से बांट दिया जाना चाहिए? एक वांछनीय विकल्प तो यह हो सकता है कि व्यावसायिक बीमे का प्रावधान हो, जहां किसी बीमांकक द्वारा प्रीमियम इस आधार पर तय किया जाए इससे किसको किस हद तक खतरा है।

चौथी, भारत ऐसी तकनीक कैसे चुनेगा जो जोखिम को कम करे? निश्चित ही विशेषज्ञ इस बारे में कुछ कहेंगे और आपूर्ति करने वाली फम्र्स सरकार के प्रमुख अनुबंध हासिल करने के लिए अपने उत्पादों को आक्रामक तरीके से प्रमोट करेंगी। यदि खुले बाजार की सौदेबाजी की प्रक्रिया अपनाई जाती तो अनुबंधों को गुणवत्ता और सुरक्षा के हिसाब से कीमत के आधार पर तय किया जाता।

परंतु सरकारी खरीद प्रणाली में दूसरे कारक भी शामिल हो सकते हैं, जो निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि प्राधिकारी इस वर्ष कर्ज, पुनर्भुगतान, मुद्रास्फीति और खाद्य वस्तुओं की महंगाई और तेल सब्सिडी के चलते कई स्तरों पर बजट में कमी को देखते हुए अपेक्षाकृत सस्ती तकनीक को अपनाने का निर्णय लेते हैं तो भारत को पुराने उपकरणों व तकनीकों, जिनके जोखिम के बारे में सब जानते हैं, का वैश्विक कबाड़खाना बन जाने का खतरा है।

पांचवीं, बड़ी संख्या में परमाणु पावर प्लांट्स के विकल्प जल्द ही खड़े होंगे और स्वीकृति के लिए परियोजनाएं-दर-परियोजनाएं कतार में होंगी। इन परियोजनाओं की असुरक्षा और जोखिम के निर्धारणों का अंकेक्षण कैसे होगा? राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जल्द ही ऐसे दिशा-निर्देश बनाएगा। क्या यह काफी होगा? क्या ऐसे दिशा-निर्देशों से अतीत में मदद मिली है? क्या यह प्रक्रिया सरकारी अधिकारक्षेत्र में बनी रहेगी? सुरक्षा में सुधार के लिए इन प्रक्रियाओं और मानकों की पारदर्शिता बरकरार रखनी चाहिए।

छठी, परमाणु खतरे को कम करना किसी एक एजेंसी का एजेंडा नहीं हो सकता। इसके लिए व्यापक पैमाने पर लोक व निजी सहभागिता जरूरी है, जो बेहतर प्रशासन, प्राइवेट सेक्टर के जुड़ाव, सैन्य तत्परता और यहां तक कि क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर गौर करने की मांग करती है। ज्यादातर एजेंडा सार्वजनिक प्राधिकरणों व विशेषज्ञ समितियों द्वारा ही तय किए जाएंगे। हालांकि, विश्वव्यापी अनुभव बताता है कि रडियोधर्मी पदार्थ के रिसाव या इस शक्ति के दुरुपयोग की चेतावनी अक्सर किसी नागरिक या जनसमूह द्वारा दी जाती है। नागरिक समाज को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि ऐसे खतरों की चेतावनी देने का मार्ग हमेशा खुला रहे।

सातवीं, भारत को इन परमाणु गतिविधियों की सुरक्षा के अलावा उच्च मानकों व जवाबदेही को प्रवर्तित करने के लिए नवीनीकृत नेशनल लीगल फ्रेमवर्क की जरूरत होगी। कौन इस सुरक्षा ढांचे व मानकों को तैयार और प्रवर्तित करेगा? सरकार को साधारण शर्ते पर यह जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए। नागरिकों और समाज को सेफ्टी व रिकवरी ब्लूप्रिंट्स की तैयारी के लिए एक और त्रासदी का इंतजार नहीं करना चाहिए।

उन्हें भोपाल गैस त्रासदी से सबक लेना चाहिए जिसमें मुआवजे के लिए दशकों से कानूनी प्रक्रिया, मुकदमेबाजी और संघर्ष चल रहा है। नागरिकों को एक समुचित नया फ्रेमवर्क स्थापित करने के लिए सक्रिय रूप से अपने संसदीय प्रतिनिधियों के साथ काम करना चाहिए। वास्तविक जोखिम के पुख्ता समाधान से जुड़े इन सवालों के जवाब देने के लिए राजनेताओं को भी तैयार रहना चाहिए।





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