संपादकीय. गांधीजी कहा करते थे कि अच्छा साध्य बुरे साधनों से नहीं प्राप्त किया जा सकता, क्योंकि ऐसे हासिल किया गया साध्य भी अंतत: अच्छा नहीं रह जाता। लेकिन गांधीजी के नाम की माला जपने वाले जो राजनीतिक दल सरकार त्नबचानेत्न और त्नगिरानेत्न के अपने-अपने त्नपवित्रत्न साध्यों को पाने में लगे हुए हैं उन्हें त्नसाधनोंत्न की शुचिता की कोई परवाह नहीं है।
यही वजह है कि चार दिन बाद होने वाले संसद के विशेष सत्र में विश्वास-अविश्वास मत की अग्निपरीक्षा में जीत सुनिश्चित करने के लिए दागी और सजायाफ्ता सांसदों की खुशामद की जा रही है। देश का कानून भी वही है और पार्टियों की राजनीतिक नैतिकता का ढकोसला भी वही है, सिर्फ परिस्थितियां बदली हैं इसलिए कसौटियां भी बदल र्गई।
दागी सांसदों के मुद्दे पर पिछले साढ़े चार साल में संसद का शायद ही कोई ऐसा सत्र रहा हो जिसमें हंगामा न खड़ा हुआ हो, लेकिन आज वही सांसद अचानक सबके लिए त्नआदरणीयत्न हो गए और उनके लिए सीधे कारागार से लोकसभा तक लाल कालीन बिछा दिया गया।
राजनीतिक दलों की यही व्यग्रता चुनाव लड़ने, उम्मीदवार तय करने, जीतने की क्षमता का आकलन करने और पर्याप्त बहुमत न होने पर सरकार बनाने के अवसरों पर भी नजर आती है। इसलिए यह एक बड़ा सवाल है जिसका दोष सिर्फ गठबंधन राजनीति और अस्पष्ट जनादेश के मत्थे डालकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता।
राजनीति का अपराधीकरण और अपराध व अपराधियों का राजनीतिकरण भी कहीं न कहीं इसी मूल्यहीन राजनीति के गर्भ से पैदा हुए हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यदि किसी गलत प्रवृत्ति को सभी राजनीतिक दल सहर्ष अंगीकार कर लेते हैं, तो उसे त्नआदर्शत्न मान लिया जाएगा। सवाल यह भी नहीं है कि यदि बाहुबली और अपराधी किस्म के लोग किसी तरह चुनाव जीतने में सफल हो जाते हैं, तो उनके सारे गुनाह माफ हो जाएंगे।
यह जनता की नहीं, चुनाव प्रक्रिया की कमी मानी जाएगी। इसलिए ऐसे त्नजन प्रमाण पत्रोंत्न के आधार पर कोई सरलीकृत निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसलिए यदि राजनीतिक दल किसी व्यक्ति को महज त्नसांसदत्न होने के नाते दागमुक्त और निष्पाप मानकर गले लगाने को बेचैन हैं, तो यह उनको मुबारक हो सकता है, देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए शुभ नहीं हो सकता।