भोपाल. घाटे में डूबे प्रदेश के निगम- मंडलों का वार्षिक लेखा- जोखा समय पर तैयार नहीं होने से उनका आडिट तक नहीं हो पा रहा है। लगभग आधा दर्जन उपक्रम ऐसे हैं, जिनका वार्षिक लेखा-जोखा आठ बरस बाद भी तैयार नहीं हो पाया है। ऐसे में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने नाराजगी जताई है। पहले मुख्यमंत्रियों द्वारा निगम-मंडलों की समीक्षा की जाती थी,लेकिन यह क्रम वर्ष 1994 से टूटा तो अब तक किसी ने इनकी समीक्षा नहीं की।
सूत्रों के मुताबिक वित्तीय कुप्रबंधन के कारण घाटे में डूबने की वजह से आधा दर्जन निगम-मंडल बंद हो गए है और लगभग इतने ही घाटे के दलदल में धंसते जा रहे है। कम्प्यूटराइजेशन और चार्टड एकाउंटेंट की सेवाएं लेने के बावजूद सार्वजनिक उपक्रमों का समय पर आडिट न होना आश्चर्यजनक है। नियंत्रक महालेखा परीक्षक के बार-बार आग्रह करने और चेतावनी देने के बाद भी निगम मंडलों ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली।
पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक वित्त निगम ने वर्ष 1998-99 से लेखा-जोखा तैयार नहीं किया है। इसी प्रकार आदिवासी वित्त एवं विकास निगम में वर्ष 2000-01 से, हस्तशिल्प विकास निगम एवं कृषि उद्योग विकास निगम में वर्ष 2002-03 से तथा पर्यटन विकास निगम में वर्ष 2003-04 का वित्तीय लेखा तैयार नहीं हो पाया है।
राज्य विद्युत मंडल एवं औद्योगिक विकास निगम में वर्ष 2004-05 तक का लेखा-जोखा व्यवस्थित नहीं है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वर्ष 2007-2008 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005-06 तक जिन निगम- मंडलों का लेखा- जोखा तैयार नहीं हो पाया उनमें -लघु उघोग निगम, पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, औद्योगिक विकास निगम भोपाल, वन विकास निगम, उर्जा विकास निगम, राज्य खनिज विकास निगम, मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, औघोगिक विकास निगम रीवा, भंडार गृह विकास निगम, वित्त विकास निगम शामिल हैं।
ये निगम-मंडल बंद हुए- मप्र राज्य उद्योग निगम,मप्र राज्य सड़क परिवहन निगम,भूमि विकास निगम,फिल्म विकास निगम,चर्मशिल्प विकास निगम,राज्य वस्त्र निगम, ग्रामीण आवास मंडल,सेतु निगम। लिखा-जोखा अपडेट होना चाहिए। इस बारे में हमने आवश्यक निर्देश दिए है।
-बाबूलाल गौर, सार्वजनिक उपक्रम मंत्री।
ढाई दशकों में पहली दफा तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने वर्ष 1985 में 26 सार्वजनिक उपमक्रमों की समीक्षा की थी। उसके बाद वर्ष 1991 में तत्कालीन सीएम सुंदरलाल पटवा ने 14 निगम-मंडलों की समीक्षा की। इस श्रृंखला में वर्ष 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक दर्जन उपक्रमों की समीक्षा की। उसके बाद पिछले 14 वर्षे से यह सिलसिला थमा हुआ है।