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फील्ड-विजिट में सवाल ही सवाल

बीकानेर. field नगर विकास न्यास की ओर से चलाए जा रहे कामकाजों की जांच के लिए लगाए गए दो सेवानिवृत्त अभियंताओं ने न्यास के अभियंताओं की लंबी क्लास ली और क्वालिटी कंट्रोल के लिए हर बात पर चेक सिस्टम लागू करने के लिए कहा। बाद में सड़क निर्माण व चौड़ाई के कामों का निरीक्षण करने पहुंचे दोनों अभियंताओं ने कामकाज को लेकर भी हिदायतें दी।

जांच कार्य शुरू करने से पहले सेवानिवृत्त अभियंता मानसिंह इंदा और डी.एस.यादव ने न्यास अभियंताओं से पूछा कि आपके पास जांच के लिए क्या साधन-संसाधन है। इस सवाल का अभियंताओं के पास कोई जवाब नहीं था। यादव ने कहा कि जब आपके पास कामकाज की गुणवत्ता को जांचने के लिए मशीनें नहीं है, तो क्या रिपोर्ट बनाएंगे और क्या निर्देश देंगे। उन्होंने कहा कि मौके पर जांच की सभी मशीनें होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कामकाज पर नियंत्रण रखने के लिए जरूरी है कि जो भी रॉ-मैटेरियल पहुंचे, उसकी गुणवत्ता के संबंध में जानकारी हो। हो सकता है कि जो बजरी, कांकर या सीमेंट हमें उपलब्ध हो रही हो, वह निर्धारित मापदंडों के अनुरूप नहीं हो लेकिन इसका मतलब फिर यह भी नहीं होना चाहिए कि ठेकेदारों को फिर भुगतान भी निर्धारित कीमत पर हो।

जैसी सामग्री लगे, उसी के आधार पर भुगतान भी हो। यह तब ही संभव है जब अभियंता कामकाज पर नियंत्रण रखेंगे। अभियंताओं की क्लास लेने के बाद डी.एस.यादव और मानसिंह इंदा न्यास अध्यक्ष श्रीगोपाल अग्रवाल के साथ कामकाज का निरीक्षण भी किया। इस दौरान न्यास सचिव भींवाराम चौधरी, अधिशासी अभियंता रामनारायण चौधरी आदि भी शामिल थे।

जांच के दौरान राव बीकाजी स्टैच्यू के सौंदर्यीकरण की योजना पर विचार हुआ। गांधीपार्क के पास सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए गए। यहां बेलास्ट के नीचे डाली जाने वाली कंकर (जीएसपी) को मापदंडों के अनुरूप नहीं माना गया।

ढोलामारु के सामने बन रही सीसी रोड के काम को संतोषजनक माना गया लेकिन ठेकेदार को काम की गुणवत्ता में निखार लाने के निर्देश दिए गए। यहां कार्य की प्रक्रिया को ठीक माना गया। जयनारायण व्यास कॉलोनी, जोड़बीड़ आदि क्षेत्रों में भी कामकाज का निरीक्षण किया गया।

कहीं रजिस्टर नहीं मिला तो कहीं मसाले में दोष दिखा

बीकानेर. त्नगलत है तो ठीक है, ठीक है तो ठीक है लेकिन यह पता तो चले की काम क्या हो रहा है।त्न इंदिरा गांधी नहर परियोजना ये सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता डी.एस.यादव ने यह तब कहा जब उन्हें गांधी पार्क के पास चल रहे काम में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का रजिस्टर में संधारण नहीं मिला। उन्होंने मौके पर रजिस्टर मंगवाया और बोले कि जैसा सामान लगे वैसा दर्ज होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आप पर कभी भी चार्ज लग सकता है।

अभी तो आपको पावर है कि आप काम को रुकवा दो या जैसा हो रहा है, वैसी रिपोर्ट कर दो। यहां कंकर की क्वालिटी, पानी के छिड़काव के साथ कूटाई और बेलास्ट की लेयर आदि पर भी सवाल किए गए।

ढोलामारु के सामने चल रहे सीसी रोड निर्माण कार्य में लग रहे मसाले को लेकर उन्हें आपत्ति थी। मानसिंह इंदा ने मसाले की जांच के लिए देशी तरीके का इस्तेमाल किया और कांच के गिलास में मसाले को डालकर पानी भर दिया। मौके पर पड़ा वायब्रेटर काफी देर तक स्टार्ट नहीं हो सका लेकिन बाद में इसे शुरू करके जांच किया गया तो काम संतोषजनक मिला। सूत्रों का कहना था कि जब दोनों अभियंताओं ने मैटेरियल को तौलने और गुणवत्ता परखने संबंधी मशीन कार्यस्थल पर होने या नहीं होने की जानकारी चाही तो जवाब संतोषजनक नहीं मिला। बाद में जब जांच दल पहुंचने के दौरान ही मशीनें पहुंचनी शुरू हुई।

नागरिकों को करनी होगी निगरानी

शहर में शुरू हुए लगभग 70 करोड़ रुपए के कामकाज की निगरानी को लेकर अब हर ओर चिंता है। काम को देखते हुए लगभग हर आदमी इस बात से सहमत है कि इतना काम पहले कभी नहीं हुआ।

जिस तरह से काम की योजना बनाई गई है, शहर को एक नया लुक मिलेगा। यह भी छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि यह काम सीएम-विजिट को देखते हुए हो रहा है और आलोचना करने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि अगर बीकानेर के अधिकारी और नेता चाहते तो यह विकास काफी पहले ही हो चुका होता और इसके बाद अगर सीएम-विजिट होती तो बीकानेर के हिस्से आने वाला विकास वास्तव में इस शहर की खूबसूरती को निखारने वाला होता। अब जो विकास होगा वह आधारभूत ढांचे को मजबूत करने वाला होगा। इसे सुंदरता देने में समय लगेगा।

ऐसे में शहर के जागरुक नागरिकों का कहना है कि जो भी पैसा लगे उसमें पारदर्शिता होनी चाहिए। जरूरत पड़े तो इसके लिए जागरुक नागरिकों की समिति बनाई जाए। इस समिति में अभियंताओं के अलावा ऐसे लोग भी शामिल हों जो शहर का हित सोचते हों। हालांकि अधिकारी इस पक्ष में नहीं हैं। अधिकारियों का कहना है कि ज्यादा रसोइये खाना खराब कर देते हैं लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा है जब करोड़ों रुपए खर्च करने हैं और निगरानी करने वालों की संख्या काफी कम है।





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