Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
भारत के 1957 में बने कॉपीराइट एक्ट के तहत एक फिल्म के अधिकार 60 वर्ष पश्चात समाप्त हो जाते हैं और उसे कोई भी व्यक्ति मूल निर्माता से आज्ञा लिए बिना अपने ढंग से बना सकता है। फिल्म उद्योग को गंभीर प्रयास करना चाहिए कि यह अवधि 60 से बढ़कर 100 वर्ष हो जाए जैसा कि अनेक देशों में है। मौजूदा कानून के तहत आज कोई भी व्यक्ति राजकपूर की ‘आग’ से लेकर ‘जागते रहो’ (1956) तक सारी फिल्मों को दोबारा बना सकता है।
शांतारामजी की ‘दुनिया न माने’ से लेकर ‘दो आंखें बारह हाथ’ तक के खजाने को कोई भी लूट सकता है। इसी तरह ‘मदर इंडिया’ और ‘प्यासा’ भी खुले बाजार का माल हो चुके हैं। कुछ वर्ष पूर्व चार्ली चैपलिन की श्याम-श्वेत फिल्मों को रंगीन बनाने का प्रयास अदालत ने ये कहकर रोक दिया कि यह एक मास्टर की रचना के साथ अनैतिक छेड़छाड़ है।
हमारे यहां जनता के अधिकार के तहत कौन इस तरह के मुकदमे दायर करेगा? अमेरिका की एक घटना है जब, घोर नैराश्य से घिरे आदमी की ‘प्री फ्रंटल लोबोक्टामी’ नामक सर्जरी कर दी गई और और वह चिंता मुक्त हो गया परंतु अब वह मशीनवत चलता-फिरता है और संवेदना के स्तर पर शून्य हो चुका है।
मरीज के भाई ने कोर्ट में केस दायर किया और फैसला यह आया कि ईश्वर की रचना में आमूल परिवर्तन नहीं किया जा सकता और ‘प्री फंटल लोबोक्टामी’ अवैध ऑपरेशन हो गया। ठीक इसी तरह मास्टर्स की फिल्म कृतियों से छेड़छाड़ करना गैरकानूनी होना चाहिए। अफसोस यह है कि यश चोपड़ा के अतिरिक्त किसी भी निर्माता ने मंत्रालय में नियम परिवर्तन की पहल नहीं की। यह कमाल का उद्योग है कि अपनी ही विरासत के बचाव के लिए युद्ध नहीं करता।
एक्शन फिल्म बनाने वाले अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कोई एक्शन नहीं लेते। पूना फिल्म संस्थान में अनेक पुरानी फिल्में सुरक्षित रही हैं, परंतु कर्तव्यपरायण अफसर नायर के सेवानिवृत्त होने के बाद सिने इतिहास पर धूल की परतें जमा हो रही हैं। कौन आवाज लगाए कि ‘जागते रहो।’