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Shekhawati Shekhawati झुंझुनूं. क्या शहादत को भी अलग-अलग तराजू पर तोला जा सकता है। क्या शहीद के साथ यह सौतेलापन उचित कहा जा सकता है कि एक जवान मिल्रिटी का है और दूसरा पैरामिल्रिटी फोर्स का।
राज्य सरकार द्वारा हालिया जारी एक आदेश से तो यही लगता है। सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध से लेकर मार्च 1999 तक शहीद हुए सैनिकों के आश्रितों को अनुकंपा नौकरी देने में शहीदों के आश्रितों के साथ कुछ इसी तरह का सौतेलापन किया जा रहा है।
राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने हालिया आदेश जारी किया है कि राज्य के सशस्त्र बलों के किसी एक आश्रित सदस्य को जो एक जनवरी 1971 से 31 मार्च 1999 के बीच युद्ध, आतंकवादी घटना, किसी ऑपरेशन, जवाबी या प्रतिरक्षा कार्रवाई में शहीद हुआ हो या फिर स्थाई रूप से अशक्त हो गया हो तो उसके किसी एक आश्रित को अनुकंपा नौकरी दी जाएगी।
मगर इस आदेश को राज्य सैनिक कल्याण विभाग ने ऐसा तोड़-मरोड़ कर जिला सैनिक कल्याण कार्यालयों को भेजा है कि शहादत को ही बांट दिया गया। इन आदेशों में इन शहीदों के आश्रितों को अनुकंपा नौकरी के लिए आवेदन करने की तमाम प्रक्रियाओं और योग्यताओं का तो जिक्र किया गया है। लेकिन साथ ही यह भी लिख दिया गया कि केवल सेना के शहीद जवानों के आश्रितों को ही यह अनुकंपा नौकरी दी जाएगी, जबकि अर्ध सैनिक बल जैसे बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, आईबी जैसे अन्य अर्ध सैनिक बल के शहीदों और अशक्त हुए जवानों के आश्रितों को यह सुविधा नहीं मिलेगी।
इतना ही नहीं इस सौतेले आदेश को बाकयदा अंडरलाइन करते हुए बड़े अक्षरों में अंकित करते हुए जिला सैनिक कल्याण अधिकारियों को भेजा गया है। बॉर्डर पर मातृभूमि की रक्षा के लिए साथ-साथ कुर्बान हुए मिल्रिटी और पेरामिल्रिटी फोर्सेज के जवानों की शहादत में सिविल सेवा के अधिकारियों ने दूभांत पैदा कर दी है। इतने सालों से नौकरी के लिए मारे-मारे घूम पैरामिल्रिटी फोर्सेज के शहीदों के आश्रितों के लिए यह फरमान वज्र प्रहार से कम नहीं।
म्हारा कुणबा ने नौकरी क्यूं कोनी देय री सरकार, मिनख तो म्हारो भी शहीद हो यो हो।
-पतासीदेवी, वीरांगना, सीआरपीएफ शहीद बीरबलसिंह, बास कालियासर
इस तरह के आदेश राज्य सैनिक कल्याण विभाग ने दिए हैं तो यह गलत है। शहादत को आप क्लासीफाइड नहीं कर सकते। पैरामिल्रिटी फोर्सेज के जवानों के शहीद आश्रितों को भी उतने ही हक और सुविधाएं मिलनी चाहिएं, जितनी कि आर्मी के शहीद जवानों के आश्रितों को। हालांकि पैरामिल्रिटी फोर्सेज के मामले गृह मंत्रालय और आर्मी के मामले रक्षा मंत्रालय डील करता है।
- एसबीसिंह, रिटायर्ड कर्नल झुंझुनूं
ये है सरकारी फरमान
झुंझुनूं देश में सर्वाधिक शहीद देने वाला जिला है। आजादी के बाद यहां अभी तक 450 के करीब शहीद हो चुके हैं। इनमें 71 से 99 तक के शहीदों की संख्या जिले में 180 के करीब है। जिन्हें इस आदेश के बाद नौकरियां हासिल होनी है। लेकिन नियमों के झमेले में ये नौकरियां आधी कर दी गई। नौकरी देने के आदेशों पर गौर करें तो लगता है कि इनमें से करीब 5-10 प्रतिशत आश्रितों को ही रोजगार मिल पाएगा।
नियमों की पेचिदगियां और उम्र सीमा तय करना तथा विवाहित पुत्रियों को लाभ से वंचित रखने से इन परिवारों के अरमानों पर पानी फिर गया है। काबिले गौर है कि भारत पाक युद्ध में शहीद काफी कम उम्र के थे। उनमें कई ऐसे भी थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। किसी को बच्चा नहीं था तो कइयों के एक ही बच्चा था, जिसका वे अपने आर्मी हैडक्वार्टर में नाम नहीं दर्ज करवा पाए थे। जबकि अब आवेदन के समय इन आश्रितों को आर्मी हैडक्वार्टर की ओर से जारी डिस्चार्ज सर्टिफिकेट या अन्य प्रमाण पत्रों में शहीदों के बच्चों के नाम दर्ज होने को अनिवार्य कर दिया है।
सैकंड वल्र्ड वार की विडो पेंशन को तरसी
सैनिकों का जिला होकर भी सैनिक परिवार कई समस्याओं से दो चार हैं। सैकंड वल्र्ड वार के सैनिकों की विडोज को तत्कालीन भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने अमलगेटेड फंड से सम्मान राशि देना शुरू किया था। शुरुआत 300 रुपए महीने से हुई थी, जो अब बढ़कर 800 हो गई है। मगर पिछले चार-पांच महीने से सैकंड वल्र्ड वार की बूढ़ी विडोज को वित्तीय सहायता के दिलाने के लिए आठ आवेदन चिड़ावा और 10-12 आवेदन झुंझुनूं जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय से जिला प्रशासन को भेजे गए थे।
जो आवेदन फार्मो में कमियों के बहाने इस दफ्तर से उस दफ्तर घूम रहे हैं। 1939 से 45 तक के इस युद्ध के गिने-चुने सैनिकों और उनकी पत्नियों को 800 रुपए की सहायता वैसे भी इस महंगाई के जमाने के हिसाब से ऊंट के मुंह में जीरा है मगर इसके लिए भी उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। जिला सैनिक कल्याण अधिकारी चिड़ावा मेजर कप्तानसिंह ने बताया कि दो बार फाइलों में कमियां बताकर वापस लौटा दीं गई।