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अब मजदूरी में भी सेंध

इंदौर. शहर में निजी व सरकारी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में छोटे-मोटे काम करने वाले 50 फीसदी से ज्यादा लोग शोषण के शिकार हैं। इन्हें सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। न्यूनतम वेतन अधिनियम लागू करने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की है लेकिन वह भी शिकायत मिलने का इंतजार करता है।

न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत अकुशल श्रमिक को 3070 रुपए, अर्धकुशल को 3200 और कुशल श्रमिक को 3350 रुपए प्रतिमाह न्यूनतम मजदूरी मिलना चाहिए। इतना ही नहीं किसी कर्मचरी का न्यूनतम वेतन निर्धारित वेतन व परिवर्तनशील महंगाई भत्ते से कम है तो वह अंतर की राशि क्लेम कर सकता है। फिर भी कई पेट्रोल पम्प के कर्मचारी, निजी सुरक्षाकर्मी, दुकानों पर काम करने वाले लोग इससे भी कम मेहनताने पर काम कर रहे हैं। इनमें से कई तो एक ही जगह पांच-पांच साल से जमे हैं। फिर भी डेढ़-दो हजार रुपए महीना ही मिल रहा है।

राजेश सिंह रीगल चौराहा स्थित पेट्रोल पम्प पर चार साल से आठ घंटे रोज काम कर रहे हैं। अनुभव के लिहाज से उन्हें अर्धकुशल श्रमिक के दर्जे में रखना चाहिए लेकिन पम्प संचालक दे रहा है 1200 रुपए महीना।

>> राजू यादव महू नाका पम्प पर दो साल से पेट्रोल भरते हैं। रोज 12 घंटे काम के एवज में ढाई हजार रुपए महीना ही वेतन दिया जा रहा है।
>> व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्था में एक साल से काम कर रहे दिनेश नामदेव को 1800 रुपए महीना ही मिलते हैं।
>> मेघदूत उपवन में माली पंकज पिपरिया तीन साल से आठ घंटे रोज काम कर रहे हैं लेकिन वेतन है दो हजार रुपए महीना।
>> वहीं आठ साल से देखभाल कर रहे राजेश गौर का वेतन तो 1800 रुपए महीना ही है।
>> गोविंद वाघ तीन साल से एक कंपनी में सुरक्षाकर्मी हैं। रोज आठ घंटे ड्यूटी बजाते हैं लेकिन वेतन है दो हजार रुपए।

कोई शिकायत आती है तो जरूर कार्रवाई करते हैं और न्यूनतम वेतन के अंतर का 10 गुना वसूलते हैं। इसका पालन न हो तो लेबर कोर्ट में केस फाइल किया जाता है।
- एल के पाठक, डिप्टी लेबर कमिश्नर





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