इंदौर.
नगर निगम कोषालय की सुरक्षा बिना कारतूस की बंदूकों के हवाले है। इसमें ही रखी तीन बंदूकें 34 साल से तालों में कैद हैं। इस दौरान न किसी ने इनकी सुध ली, न कारतूस खरीदे गए। अब निगम बजट में इनके लिए कोई प्रावधान भी नहीं होता। हालांकि निगमायुक्त इनकी सुध लेने का वादा करते हैं।
प्रदेश की नगर निगमों में यह इकलौता कोषालय है और रखरखाव के अभाव में बंदूकें चलने योग्य भी नहीं बची हैं। यहां तक कि इनके लाइसेंस कहां हैं यह भी पता नहीं है। इनकी रिपेयरिंग के लिए तीन महीने पहले लेखाधिकारी को आवेदन भी दिया गया था, जो रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया।
पहले निकलती थी दीवाली पर
34 साल पहले ये बंदूकें दीवाली पर निकलती थीं और पूजा के बाद इनसे हवाई फायर किया जाता था।
लाखों रुपए और जरूरी कागजात
खजाने में जरूरी कागजात के साथ लाखों रुपए भी रहते हैं जिसकी सुरक्षा के लिए चार गार्ड भी हैं लेकिन बंदूक चलाना एक ही जानता है।
कभी नहीं चलाना पड़ी
खजांची दिलीपसिंह चौहान 34 साल पहले यहीं गार्ड के रूप में नियुक्त हुए थे। उन्होंने बताया कभी इन्हें खजांची कार्यालय के बाहर शान से रखा जाता था लेकिन अब कोई पूछ-परख नहीं। हालांकि आज तक इन्हें चलाने का कोई मौका नहीं आया।
..तो लाठी की तरह चलाएंगे
बंदूक चलाना जानने वाले गार्ड लक्ष्मण मौर को यहां नौकरी करते पांच साल हो गए। बंदूक के लिए कारतूस तक नहीं हैं, ऐसे में कभी जरूरत पड़ी तो इसे लाठी की तरह उपयोग किया जाएगा।
जिन बंदूकों की रिपेयरिंग संभव है करवाएंगे। जो चलने योग्य नहीं हैं, बदल देंगे। कारतूस की व्यवस्था भी जल्दी ही करेंगे। हालांकि निगम की सुरक्षा व्यवस्था जल्द ही निजी हाथों में होगी, जिसमें राइफल गार्ड शामिल है।
- नीरज मंडलोई, आयुक्त, नगर निगम