शब्दश:
लोग जानना चाहते हैं कि परमाणु करार को लेकर जिस राजनीतिक अस्थिरता के दौर से इस समय देश रूबरू है, उसका पॉजीटिव पहलू क्या हो सकता है। एक बात तो तय है कि जो भी सरकार इस समय यूपीए के नाम पर बची हुई है, वह अपनी तमाम कोशिशों के बाद अगर विश्वास मत प्राप्त करने में कामयाब हो भी जाती है तो भी वैसी तो निश्चित ही नहीं होगी जिसे कि जनता ने चार वर्ष पूर्व चुना था। सरकार अगर गिर जाती है तो भी ऐसा उस विपक्ष के हाथों हुआ नहीं माना जाएगा जिसे कि सरकार की चाल-चलन की निगरानी करने की जिम्मेदारी के साथ मतदाताओं ने अपना समर्थन सौंपा था।
वर्तमान में चल रही वर्चस्व की लड़ाई का सुखद पक्ष शायद यह हो सकता है कि देश शायद एक नए प्रकार के राजनीतिक ध्रुवीकरण और नेतृत्व से साक्षात्कार करना चाहता है। बहुत मुमकिन है कि गाजर-घास की तरह राजनीति पर काबिज और नकारा साबित हो चुके नेताओं की एक बड़ी फौज अगले संसदीय चुनावों के बाद जनता के बीच से पूरी तरह गायब हो जाए। जो कुछ चल रहा है, उसे जनता देख रही है। जनता की चुप्पी का अर्थ उसकी असहायता नहीं है।
अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर वामपंथियों और यूपीए सरकार के बीच कोई एक साल से तकरार चल रही थी। शुरुआत जुलाई, 2007 में हुई थी। भारत की संसदीय राजनीति में शायद यह पहला अवसर है, जब वैचारिक मतभेदों को राष्ट्रव्यापी बहस में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है और उसके लिए सरकार के भविष्य को भी दांव पर लगा दिया गया है। यह एक पॉजीटिव उपलब्धि है।
वर्ष 1996 से 1999 के बीच देश में तीन प्रधानमंत्रियों की सरकारें बनीं और गईं पर राष्ट्रीय महत्व के किसी मुद्दे के चलते ऐसा नहीं हुआ। देश में अब तक अधिकांश परिवर्तनों का कारण या तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं रहीं या फिर सहानुभूति की लहर ने काम किया। भारत की राजनीति का यह बदलता हुआ और उजला पक्ष है कि अब ऐसे मुद्दों को लेकर सरकारों को सत्ता में बनाए रखने या हटा देने का सिलसिला प्रारंभ हुआ है जिनके कि राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छे या बुरे परिणाम निकल सकते हैं।
राष्ट्र की यह चिंता अपनी जगह कायम रहेगी कि सरकार को बचाने और गिराने के लिए हर तरह के हथकंडे जनता के वे ही नायक अपना रहे हैं, जिन्होंने राजनीति में नैतिक मूल्यों की स्थापना करने की कसमें खाने में कभी संकोच नहीं किया। मौजूदा राजनीतिक अफरा-तफरी की एक अन्य सकारात्मक उपलब्धि यह है कि वामपंथी दलों की राष्ट्रीय पहचान कायम हुई है। वे काफी हद तक उन राज्यों के लोगों तक भी अपनी बात और प्रतिबद्धता पहुंचाने में कामयाब हुए हैं, जहां एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उन्हें अब तक जाना नहीं जाता था। इसका सीधा अर्थ यह है कि आने वाले समय में वामपंथी दल संसद में एक ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं।
समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम आदि दलों को एकजुट कर जो तथाकथित तीसरा मोर्चा बना व बिखर गया, उसके अब फिर से जीवित होने की संभावनाएं वामपंथियों ने सीमित कर दी हैं। इस पूरी कसरत ने देश के अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिए भी छोटी-छोटी खिड़कियों के स्थान पर नए और बड़े दरवाजे खोल दिए हैं। इसका नुकसान कांग्रेस को ही होना है।
वर्तमान राजनीतिक तूफान जब भी शांत हो, देश अपने नए नायकों के रूप में राहुल गांधी, प्रकाश करात और ए.बी. बर्धन जैसे नेताओं के नेतृत्व की ओर रुख कर सकता है। राहुल गांधी ने जो राजनीतिक मेच्योरिटी दिखाई है, वह कांग्रेस के अन्य नेताओं के मुकाबले उन्हें अलग खड़ा करती है। इसे राहुल गांधी का सत्ता की राजनीति में विधिवत प्रवेश भी माना जा सकता है। वर्तमान संकट की नई खोज यह है कि विपक्ष सरकार से बाहर ही कोई चीज नहीं है, वह सरकार के साथ रहते हुए भी न सिर्फ व्यक्त हो सकती है, उसे राष्ट्र को महसूस भी कराया जा सकता है।
विश्वास मत के खिलाफ मतदान में भाजपा और वामपंथी साथ-साथ खड़े दिखाई देते हुए भी इस मायने में अलग-अलग रहेंगे कि असली विपक्ष की भूमिका तो वामपंथी दलों ने निभाई है। बाढ़ का पानी चाहे जब भी उतरे, जनता को पता है कि नैतिक मूल्यों का जो भी नुकसान होना था, वह तो हो ही गया है। अब तो केवल कचरे और कीचड़ को साफ करने के काम से ही देश को जूझना है। प्रकाश की असली किरण भी उसके बाद ही नजर आएगी।
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