जोधपुर.
निरीह वन्य प्राणी को अपने ममत्व का आंचल देते हुए अपनी कोख से उत्पन्न बच्चे के दूध का हिस्सा कौन देता है? यह अविश्वसनीय कार्य वन्य प्राणियों के लिए जान न्यौछावर करने वाले विश्नोई समाज की महिलाओं के लिए आम बात है। जोधपुर के विश्नोई बाहुल्य गांवों में महिलाएं अपने बच्चों की तरह छोटे हिरणों को अपना दूध ही नहीं पिलाती बल्कि उसे घर के सदस्य की तरह पालती है।
वन्य जीवों को घर में पालना वन्य जीव अधिनियम के तहत गैरकानूनी है, मगर विश्नोई बाहुल्य गांवों के कई घरों में हिरण के बच्चे पालना आम है। जोधपुर से करीब बीस किमी दूर विश्नोई बाहुल्य गांव बासनी बाघेराव गांव की जोगों की ढाणी में गोपाराराम विश्नोई के घर में ऐसा ही नजारा देखने का मिला।
गोपाराम के घर में दो हिरण के बच्चे पल रहे है। उनकी पत्नी रामादेवी एक हिरण को बोतल में दूध पिला रही थी,जबकि उनके भतीजे की पत्नी कोयली खुद एक हिरण को अपने गोद में बिठाकर अपने ममत्व का आंचल देते हुए बाकायदा खुद का दूध पिला रही थी। जबकि उसका एक साल का बेटा पास में बैठा अपने हिस्से का दूध हिरण में बंटते देख रहा था।
गोपाराम के भाई भाकरराम ने बताया कि जंगल में कुत्ते हिरण को बच्चे को मार रहे थे। तब दो महीने पूर्व एक हिरण और दूसरा एक महीने पूर्व ही हिरण घर लाए हैं। उन्हें घर की महिलाएं अपना दूध पिलाकर बड़ा कर रही है। बड़ा होते ही उन्हें खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। यह नजारा अकेले गोपाराम के घर का ही नहीं था बल्कि उसी गांव में रहने वाली श्रीमती सोनी देवी ने अपने घर में हिरण पाल रखा था।
गौरतलब है कि विश्नोई बाहुल्य गांवों में छोटे-छोटे हिरणों को महिलाएं अपने बच्चों की तरह पालती हैं। हिरण दूध पीने से लेकर वहां उनके बच्चों के साथ अठखेलियां करते नजर आते हैं। यहीं नहीं कुत्तों से उन बच्चों को बचाने के भी पूरे बंदोबस्त किए जाते हैं। जिन विश्नोइयों के घरों में हिरण पल नहीं रहे हैं, तब भी हिरण शावक बेहिचक पानी पीने उनके घरों में दौड़े आते हैं। यदि किसी कारणवश हिरण की मौत हो जाए तो उसे खेत के एक हिस्से में दफन कर उस पर चबूतरा बनाया जाता है।
विश्नोई समाज हिरण ही नहीं, जीव दया को अपना धर्म मानते हैं। उनके घरों में हिरण पालते तो नहीं, मगर कई बार जानवरों के जख्मी करने पर विश्नोई परिवार इलाज के लिए घरों मे ले आते हैं।
—हीराराम विश्नोई,अध्यक्ष,जांभेलाव धाम विश्नोई सभा श्री जांबा।