इंदौर. ई-मेल पर मामला वास्तविक धमकी का हो, अफवाह का या किसी की शरारत। इससे सिर्फ पुलिस ही नहीं, गुप्तचर एजेंसियां भी सकते में आ जाती हैं। पिछले तीन साल में ऐसे कई मामले हुए जिनमें जांच एजेंसियों ने सिर्फ ई-मेल भेजने वाले के बारे में बल्कि उससे संबंधित लोग व सायबर सेंटरों को खंगाल डाला और उनके विरुद्ध कार्रवाई भी की।
19 जुलाई 2006 को राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को इंदौर से धमकीभरा ई-मेल किया गया था। तब स्थानीय पुलिस के साथ केंद्रीय खुफिया एजेंसियां भी जांच में जुट गई थीं। पता चला ई-मेल अशोकनर (गुना) के छात्र सुलभ गोयल ने भेजा था, जो अनूपनगर में रिश्तेदार के यहां रहता था। तब पुलिस ने उसके कोचिंग संस्थान, साइबर कैफे सहित नजदीकी लोगों के यहां दबिश दी थी।
जांच में ई-मेल फन साइबर कैफे, नौलखा से भेजने की पुष्टि हुई थी। तब सेंटर का कम्प्यूटर जब्त कर सील कर दिया था। सुलभ के दोस्त श्रेयांश खरे को भी गिरफ्तार किया था। सुलभ ने कबूला था उसने शरारत के लिए ऐसी हरकत की थी। कार्रवाई दिल्ली तक चली। छह महीने पहले ही उसने आत्महत्या कर ली।
यह माना गया उसी अपराध के कारण ग्लानिवश ऐसा किया। कुछ साल पहले एक चैनल को आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के नाम से ई-मेल पर धमकी दी गई। तब खजराना क्षेत्र चर्चा में आया। बाद में पता चला ई-मेल भोपाल से भेजा था। ऐसे ही कटनी के 11 वर्षीय किशोर ने भी एक अखबार को ई-मेल किया था।
कठोर कार्रवाई संभव
अधिकारियों के मुताबिक इस तरह के ई-मेल की जांच बड़ी पेचीदा होती है। धमकी वास्तविक है या अफवाह, इसकी जांच में काफी समय लगता है। साजिश का पता लगे तो संबंधित व्यक्ति या आतंकवादी संगठन तक पहुंचने, गिरफ्तारी और उनके इरादे जानने के लिए गहन छानबीन लगती है। फिर धमकी सहित अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया जाता है। सिर्फ माहौल खराब करने के लिए ई मेल किया है तो अफवाह फैलाने तथा आईटी एक्ट की धारा में कार्रवाई की जाती है। उसमें पांच साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है।