इंदौर. एक ऐसे मुद्दे, जिसे लेकर जनता में कोई खास हलचल नहीं है,को लेकर इतना बड़ा कदम उठाने की मजबूरी को वाम मोर्चा जनता को कैसे समझाएगा। जो सबसे हैरान करने वाली घटना है वह यह कि वाम मोर्चा ने महंगाई जैसे सवाल को नेपथ्य में डालकर परमाणु करार के सहारे लोक सभा की नैया पार करने का फैसला किया है।
वह अपने सेक्युलर वोटरों को किस तरह समझाएगी कि परमाणु करार का मुद्दा साम्प्रदायिकता से भी बड़ा था। आगे की बात यह कि जब आगामी लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को सत्ता पाने से रोकने का एजेंडा फिर प्रमुख हो जाएगा तब कांग्रेस को ही समर्थन देना पड़ेगा। तब वह समर्थन वापसी को कैसे सही ठहरा पाएगी। वाम मोर्चा एक ऐसे धुंध में फंसा हुआ नजर आ रहा है जहां उसे वस्तुस्थिति दिखाई ही नहीं दे पा रही है।
सिर्फ प. बंगाल में हो निवेश
एक तरफ माकपा ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को निवेश की खातिर विदेशी कंपनियों को राजी करने के लिए विदेश जाने की अनुमति देने में संकोच नहीं किया तो दूसरी तरफ केंद्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को रोकने के लिए अड़ी रही। लगता है कि माकपा सुधार के बयार को सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही बनने देना चाहती है। उसे सुधार या विदेशी निवेश से परहेज नहीं है बशर्ते यह केवल उनके सत्ता वाले प्रदेश में ही हो।
यह भी भूल..
वाम मोर्चा द्वारा यूपीए को चार साल तक समर्थन देने के दौरान महंगाई ने कुलांचें लगरइ लेकिन माकपा ने कभी इस पर सख्ती नहीं दिखाई। अगर महंगाई को वामपंथी मुद्दा बनाते और इसपर समर्थन वापस लेते तो यूपीए को समर्थन देने में सपा और अन्य दलों को खासी मुश्किल का सामना करना पड़ता। वाममोर्चे की पैठ जिस जनता के बीच है उसपर करार की बजाय महंगाई की मार ज्यादा है। करार का मुद्दा देकर वाम मोर्चे ने कांग्रेस को महंगाई के ज्वलंत मुद्दे से बचने की एक ढाल दे दी है। चुनाव बाद शायद माकपा नेतृत्व एक बार फिर विश्लेषण करे और कहे कि यह एक ऐतिहासिक भूल थी।
करातवादी मार्क्सवाद
>> प्रकाश करात को अप्रैल 2005 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव चुना गया। तबसे लेकर उन्होंने मार्क्सवाद को अपने तरीके से व्याख्यायित किया। मार्क्सवाद जनता से जुड़े मुद्दों की बात करता है, लेकिन करात ने महंगाई की बजाए करार को मुद्दा बनाया जिसमें जनता की कोई रुचि ही नहीं थी।
>> मार्क्सवाद अंतरराष्ट्रीयतावाद को मानता है लेकिन करात ने उदारीकरण का विरोध कर इसकी मूल भावना के ही उलट काम किया।
>> मार्क्सवाद आम जनता के हितों को संरक्षित करने की वकालत करता है लेकिन सिंगूर की घटना में जो प्रभावित हुए वे किसान और खेतिहर मजदूर थे। इस घटना ने माकपा नेतृत्व की हकीकत को उजागर किया।
>> विदेशी पूंजी को शोषण का तंत्र समझने वाले मार्क्सवादी प्रकाश करात इंडोनेशिया से सेज लाने पर बुद्धदेव भट्टाचार्य की पीछ थपथपाते हैं।
ये गलतियां उन्हें सोने नहीं देंगी
>> भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (तब तक विभाजन नहीं) 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन का पक्ष लिया।
>> 1975 में पूरा देश इमरजेसी के खिलाफ था, भाकपा ने कांग्रेस का समर्थन किया।
>> 1996 में ज्योति बसु प्रधानमंत्री बन सकते थे। बसु ने इसे ऐतिहासिक भूल करार दिया।
>> यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन तो दिया लेकिन समर्थन वापसी के लिए महंगाई की बजाए करार को मुद्दा बनाया।