उदयपुर. महाराणा भूपाल अस्पताल के बर्न वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों को संक्रमण से बचाने के कोई इंतजाम नहीं है और इसी कारण 10 से 40 फीसदी झुलसे लोग भी सेप्टिसीमिया की चपेट में आकर मौत की नींद सौ रहे हैं। रोगियों के शरीर में जहर की तरह फैलकर मौत का कारण बनने वाले सेप्टीसीमिया को रोकने का कोई प्रबंध वार्ड में नहीं किया जा रहा।
अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी से अब तक 45 प्रतिशत और इससे कम झुलसे 19 लोगों को भी डाक्टर बचा नहीं पाए। इनमें कुछेक को छोड़कर अधिकांश की मौत का कारण भी सेप्टिसीमिक ही रहा है। संभाग के सबसे बड़े एमबी अस्पताल के बर्न वार्ड में झुलसे लोगों को भर्ती किया जाता है। गंभीर झुलसे लोगों का इस वार्ड में बच पाना मुश्किल ही माना जाता है, लेकिन कम झुलसे लोग भी नहीं बच पा रहे हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि जिन रोगियों को डाक्टर सही होते पा रहे थे, वे भी सेप्टिसीमिया की चपेट में आकर मौत का शिकार हो गए। वार्ड में दो दिन से अधिक भर्ती रहने वाले अधिकांश रोगियों की मौत कारण सेप्टिसीमिक शौक सामने आ रहा है, जिसमें रोगी ठीक होते-होते भी संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। इलेक्ट्रिक बर्न के बाद सेप्टिसीमिया ही ऐसी दूसरी बड़ी वजह सामने आ रही है जिससे मरीज की मौत हो रही है। बर्न वार्ड के पंजीयन रजिस्टर और रोगियों की मृत्यु पर्ची में ये तथ्य साफ हो रहे हैं।
मरने वालों की संख्या बढ़ी
बर्न वार्ड में मरने वालों की संख्या पर गौर करें तो जनवरी में भर्ती हुए 40 रोगियों में से 10, फरवरी में 43 में से 16 और मार्च में 49 में से 13 रोगियों की मौत हुई।
चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जनवरी से अब तक 45 प्रतिशत और इससे कम झुलसे 92 रोगी भर्ती हुए। इनमें से 19 की मौत हो गई। इनमें इलेक्ट्रिक बर्न के रोगियों के अलावा अधिकांश की मौत का कारण सेप्टिसीमिया ही जाहिर हुआ है। डाक्टरों और र्न्िसग स्टाफ का अनुभव बताता है कि जिन रोगियों के घाव ठीक हो जाते हैं, अचानक वे संक्रमण की चपेट में आते हैं और उनकी मौत हो जाती है।
मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। सरकार ने मेरे साथ अधीक्षक को भी जवाब देने के लिए नियुक्त किया है। उन्हीं से जवाब पूछे, हम समस्या से उन्हें ही अवगत कराते हैं। जरूरत होने पर वे मुझसे पूछ लेंगे।
- डॉ. आरके पालीवाल, विभागाध्यक्ष, बर्न वार्ड
वार्ड का हाल
>> नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण एक समय में एक या दो का स्टाफ ही मिलता है।
>> वार्ड में एक एचओडी और एक रेजीडेंट की ही नियुक्ति।
>> ड्रेसिंग डे के अलावा रोजाना कुछ समय छोड़कर 24 घंटे र्न्िसग स्टाफ के भरोसे ही रहते हैं रोगी।
>> इमरजेंसी में भी डाक्टरी मशविरा से तात्कालिक उपचार नहीं मिल पाता।
>> रोगियों का झुलसा हिस्सा बिना पट्टी के खुला रखना जरूरी होता है।
>> पार्टीशन या क्रेडल के अभाव में वीभत्स चेहरे देखने को मजबूर है पड़ोसी रोगी और परिजन।
>> सफाई व कीटाणु मारने के लिए प्रबंध नहीं होने से क्रॉस इंफेक्शन, मनोवैज्ञानिक प्रभाव का खतरा।
>> संख्या अधिक होने पर रोगियों को सर्जरी वार्ड में किया जाता है भर्ती।
>> सर्जरी वार्ड वातानुकूलित नहीं होने और लोगों की आवाजाही से वहां भी है इंफेक्शन का खतरा।
>> कुशलक्षेम पूछने वालों का तांता रोकने के लिए नहीं मिलता कोई चौकीदार।
उपाय जो अनिवार्य है
>> बैड के बीच पार्टिशन हो या क्रेडल से ढंका हुआ होना चाहिए।
>> इतनी सफाई की मच्छर भी ना आ पाएं।
>> नियमित सफाई और कीटाणु मारने के प्रबंध हो।
सेप्टिसीमिया का मतलब : सेप्टिसीमिया इंफेक्शन व क्रॉस इंफेक्शन से झुलसे रोगियों में होने वाला रोग है। यह वातावरण में मौजूद कीटाणुओं के कारण एक से दूसरे रोगी तक फैल जाता है। सेप्टिक (संक्रमण) का यह गंभीर रूप होता है। यह इंफेक्शन रोगी के जख्म वाली जगह पर पहुंचकर रक्त प्रवाह के साथ पूरे शरीर में फैल जाता है। इससे ग्रस्त हुए रोगी की किडनी भी काम करना बंद कर देती है।