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श्रावणी उपाकर्म इस बार दस दिन पहले!

उदयपुर. ब्राम्हणों, उपनयन संस्कार वालों को इस बार रक्षाबंधन से दस दिन पूर्व ही यज्ञोपवीत बदलना होगा। नागपंचमी, 6 अगस्त को ही ऋग्वेदीय, अथर्ववेदीय और यजुर्वेदीय ब्राम्हणों को श्रावणी उपाकर्म करना पड़ेगा जबकि रक्षाबंधन 16 अगस्त को है ऐसा इसलिए हो रहा है कि श्रावणी पूर्णिमा पर इस बार चंद्रग्रहण है और ग्रहण पर उपाकर्म के लिए शास्त्र की मनाही है।

भद्रा दोष के कारण इस बार राखी 2.37 बजे बाद बांधी जाएगी, रक्षाबंधन पर ग्रहण के सूतक का असर नहीं माना जाएगा। शास्त्रीय परंपरा है कि श्रवण नक्षत्र की पूर्णिमा पर ब्राrाण हेमाद्रि संकल्प, श्रावणी उपाकर्म करें। चारों ही वैदिकों की परंपरा में इस उपाकर्म को बहुत महत्व दिया गया है।

इस बार चूंकि पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण है इसी कारण विकल्प के रूप में हस्तनक्षत्र की पंचमी, एकादशी या ऋषि पंचमी को संकल्प करने का निर्देश है। इस बार नाग पंचमी हस्त नक्षत्र को पड़ रही है।

क्या कहते हैं शास्त्र
तिथि, काल निर्णय ग्रंथों निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु में कहा गया है कि यदि श्रावण की पूर्णिमा को ग्रहण या संक्रांति आदि हो तो उपाकर्म नाग पंचमी को किया जा सकता है। नक्षत्र ज्योतिष शोध संस्थान के अध्यक्ष पं. हरिश्चंद्र शर्मा के अनुसार यह मत विकल्प के तौर पर दिया गया है। अन्यथा पूर्णिमा को भी यह संकल्प हो सकता है। कारण कि सूर्योदय के पूर्व ही यह तर्पण करना उचित रहता है।

ग्रहण चूंकि दूसरे दिन यानि रात्रि में करीब 1 बजे है, ऐसे ेमें अधिक अंतराल है और ऋषि तर्पण में कोई दोष नहीं है। वरिष्ठ ज्योतिषी पं. अखिलेश शर्मा का मत है कि शुक्ल पक्ष की पंचमी के हस्त नक्षत्र से युक्त होने पर उपाकर्म किया जाना चाहिए, जैसा कि मदनरत्न और स्मृति महार्णव में आया है-

संक्रांतिग्रहणं वापि यदि पर्वाणि जायते।
तन्मासे हस्तयुक्तायां पंचम्यां वातदिश्यते।।

क्या है श्रावणी उपाकर्म?
पं. सुरेंद्र द्विवेदी के अनुसार यह ऋषियों का पूजन है। हमारे पुरातन ज्ञान का प्रसार ऋषियों के माध्यम से हुआ, यह ज्ञान की परंपरा का पूजन है। वर्षे पूर्व दक्षिण भारत में हेमाद्रि नामक विद्वान ने संकल्प लिखा जिसमें जाने-अनजाने हो जाने वाले ऐसे विविध कर्मे के दोषों के निराकरण के लिए प्रायश्चित का विधान है। यह इस दिन किया जाता है। इस विधान में दश प्रकार का स्नान किया जाता है।

शरीर ही नहीं, मन भी पवित्र हो जाए तब ऋषि पूजन की पात्रता होती है। इसमें जनेऊ को भी बदला जाता है- देवो भूत्वा देवं यजेत्। इसके बाद विष्णु, अरुधंती सहित सप्तऋर्षि आदि का पूजन होता है। कुशा, अपामार्ग से ऋषि बनाए जाते हैं, ब्रrा ग्रंथि वंदन कर ऋषियों का आवाहन होता है और षोडषोपचार पूजन के साथ ग्रंथ, संहिता आदि का विशिष्ट पारायण किया जाता है। इसके बाद रक्षासूत्र ऋषियों व देवों को बांधा जाता है और उसे ही बाद में बांधने की परंपरा रही है।





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