एक विश्वासमत वो है, जिस पर संसद में बहस हो रही है। एक और विश्वासमत वो भी है, जिस पर देश के गली-कूचे में, ढाबे और पनवाड़ी के पास, टीवी सेट के सामने बहस हो रही है। पहले विश्वासमत से इस सरकार के बचे-खुचे भविष्य का फैसला होगा। दूसरे विश्वासमत में फैसला सरकार पर नहीं, संसदीय राजनीति पर होगा, लोकतंत्र के भविष्य का फैसला होगा।
इसी आस्था को लिए लोकसभा में विश्वासमत पर चल रही बहस को देख-सुन रहा हूं - शब्दों की बौछार, बनावटी आक्रोश, नोकझोंक के पीछे छुपी मुस्कुराहट, अध्यक्ष की बेबसी, शिबू सोरेन का ऊंघना.. सब कुछ। बहस में सभी सवाल उठे, बस वही सवाल नहीं उठा, जिसका उत्तर पाने के लिए मेरे जैसे न जाने कितने लोग टीवी से चिपके बैठे रहे होंगे। बहुमत का सवाल उठा, सौदेबाजी के आरोप उछले। बस यह समझ नहीं आया कि परमाणु करार पर देश के राजनीतिक दल कहां खड़े हैं और क्यों? नई सदी की नई दुनिया में भारत कहां खड़ा होगा और कैसे?
दिनभर की बहस में बहुत कुछ सुना, पर कुल मिलाकर तीन अर्धसत्य सुने और देखा एक महाशून्य। पहला अर्धसत्य सत्तारूढ़ पक्ष का था। प्रधानमंत्री के शब्द संयत थे, प्रणब मुखर्जी की दलील में चतुराई थी, लेकिन एक सीधी-सी बात गोल कर गए, दोनों। आखिर बीस साल बाद देश में ऊर्जा की स्थिति को दो-चार फीसद सुधारने के लिए इतनी क्या आफत आन पड़ी कि सरकार अपनी बलि देने को तैयार हो गई? मामला ऊर्जा की तकनीक का है या अमेरिका की यारी का? पिछले सालभर से सरकार समर्थक विशेषज्ञ और अफसरशाह अमेरिका से विशेष संबंध के पक्ष में जो तमाम तर्क दे रहे हैं, उसकी एक झलक भी सरकारी पक्ष के तर्क में दिखाई नहीं दी। क्या सरकार को खुद अपने तर्क में भरोसा है?
दूसरा अर्धसत्य विपक्ष के नेता की ओर से आया। कहने को उन्होंने जरूर कहा कि बहुध्रुवीय दुनिया में वे भारत को एक स्वतंत्र ध्रुव की तरह देखना चाहते हैं। लेकिन इस मामले में उनकी और कांग्रेस की समझ में फर्क क्या है, इसका खुलासा करने से उन्होंने कन्नी काट ली। क्या वाजपेयी सरकार इसी डील की तलाश में नहीं थी, जो संयोगवश मनमोहन सिंह की झोली में आ गिरी? नहीं तो जसवंत सिंह से लेकर ब्रजेश मिश्र सब इस डील के गुणगान क्यों कर रहे हैं? भाजपा के विरोध के पीछे नीतिगत विरोध है, राजनैतिक विरोध है या सिर्फ खिसियाहट?
तीसरा अर्धसत्य लाल झंडे में लिपटा दिखा। माकपा सांसद मोहम्मद सलीम के पास सरकार के लिए तीखे सवाल जरूर थे, लेकिन यह समझाने की फुर्सत नहीं थी कि वे खुद किस जमीन पर खड़े हैं। आखिर परमाणु ऊर्जा और परमाणु हथियारों पर संसदीय वामपंथ कहां खड़ा है? अगर परमाणु ऊर्जा और बम चाहिए तो परमाणु क्लब में घुसे बिना काम कैसे चलेगा? राष्ट्रीय सुरक्षा की उनकी दुहाई भाजपा से किस तरह भिन्न है? इन अर्धसत्यों के अलावा संसद के शोरगुल में पसरा हुआ एक सन्नाटा भी सुना। एक खौफनाक महाशून्य को देखा।
पिछले दो दशक में उभरी लोकतांत्रिक शक्तियों को जैसे इस देश और दुनिया की परवाह ही नहीं है। सपा के रामगोपाल यादव के पास आइंस्टीन का अप्रासंगिक जुमला था, बसपा के ब्रजेश पाठक के पास स्कूली वाद-विवाद प्रतियोगिता के तर्क थे, शिवसेना के अनंत गीते के पास ऊर्जा की दलील थी, द्रमुक के टीआर बालू के पास सूचना व सपंर्क विभागनुमा आंकड़ें थे, तो राजद के देवेंद्रप्रसाद यादव के पास पूरी बहस को पटरी से उतारने की कला थी। जो नहीं थी, वो एक नई सदी और एक नई दुनिया में देश को समझने की चिंता।
आपने भी देखा इस महाशून्य को, संसदीय बहस के इस मखौल को? संसद में सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर वोट पड़ेगा, तो संसद में हुई इस कवायद पर आपका वोट कहां पड़ेगा? संसद में स्थापित राजनीति और उसके स्थापित विपक्ष की तरफ? या फिर आप भी मेरी तरह एक वैकल्पिक राजनीति की तलाश शुरू करेंगे? यह तलाश संसद के बाहर शुरू होगी, लोकतंत्र और संविधान के दायरे के भीतर।
(लेखक प्रमुख राजनीतिक टिप्पणीकार हैं)