सरकार जीत गई, देश हार गया। विश्वास मत पर बहस के दौरान देश और दुनिया ने जिस भारतीय संसद के दर्शन किए उसकी स्थिति उस दिन से भी बदतर थी जब उस पर हमला हुआ था। तब उसकी आबरू पर बाहर से प्रहार हुआ था। पर विश्वास मत के दौरान तो जनता के चुने हुए सम्माननीय प्रतिनिधियों ने अपने आचरण के प्रदर्शन से संसद की गरिमा और सम्मान को उसके गर्भगृह में लुट जाने दिया। सरकार को बचाने और गिराने के प्रयासों में जो कीमत अदा की गई जिस तरह के षड्यंत्र रचे गए उसके दर्शन नोटों के बंडलों की शक्ल में सारी दुनिया को कराए गए।
भारत से बाहर विश्व भर में फैले हुए अप्रवासी भारतीयों के सिर जो कुछ हुआ उसे देखकर शर्म से झुक गए होंगे। जनता के नुमाइंदों ने एक-दूसरे के खिलाफ जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया और आरोप लगाए उससे यही संकेत मिलते हैं कि अगली लड़ाई इससे भी ज्यादा गंदी होगी और खून-खराबे के बीच सड़कों पर लड़ी जाएगी।
प्रतीक्षा यही करनी है कि बदले की राजनीति अब अपने कितने घृणित रूप में प्रकट होकर देश को अगले चुनावों तक ले जाती है और किस तरह के सांसद और कैसी सरकार देश की गरीब जनता के भाग्य में बदी है। सोचकर डर लगता है कि सबकुछ देशहित के नाम पर किया गया है और परमाणु करार को लेकर जिस शर्मनाक राजनीति से जनता का मंगलवार को साक्षात्कार हुआ है वह देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाने वाली है।
परमाणु समझौते के जरिए भविष्य में प्राप्त होने वाली ऐसी बिजली के उजाले से क्या फायदा जब हम देख रहे हैं कि हमारे राजनेता पहले के मुकाबले ज्यादा काले और शातिर बनकर उभर रहे हैं। देश की गरीब जनता एक-एक पैसा जोड़कर महंगाई से लड़ने में अपनी कमर तुड़वा रही है और सांसदों के समर्थन को खरीदने के लिए करोड़ों की बोलियां लग रही हैं।
विश्वास मत के दौरान अगर यूपीए सरकार गिर जाती तो हमें पता है कि देश को कुछ ज्यादा हासिल होने वाला नहीं था। प्रधानमंत्री पद को लेकर विपक्षी दलों में मतदान के पूर्व ही संघर्ष छिड़ गया था और निश्चित ही वह लड़ाई और तेज ही होने वाली थी। पर अब जबकि मनमोहन सिंह के चेहरे पर मुस्कुराहट है और वे एक ताकतवर प्रधानमंत्री के रूप में प्रकट हुए हैं तो अपने कार्यकाल के बचे हुए दिनों में उनकी सरकार उन आश्वासनों को पूरा करके दिखाए जो कि उन्होंने और उनके सहयोगियों ने बहस के दौरान विपक्षी हो-हल्ले के बीच भी अडिग रहते हुए व्यक्त किए हैं।
इन आश्वासनों में पिछले दिनों विदर्भ के सोनखास गांव की एक झोपड़ी में शशिकला रिंगणो को राहुल गांधी द्वारा दिया गया भरोसा भी शामिल है जो अपने बेटों को तेल के दीयों की रोशनी में पढ़ाकर इंजीनियर और कलेक्टर बनाना चाहती है। राहुल गांधी ने लोकसभा में अपने भावुक भाषण के दौरान अपनी इसी विदर्भ यात्रा का उल्लेख किया था। ऐसी शशिकलाएं देश भर में फैली हुई हैं और अपने-अपने अंधेरों से संघर्षरत हैं।
कहीं ऐसा नहीं हो कि लोकसभा में जीता हुआ विश्वास का मत डॉ. मनमोहन सिंह असली जनता के बीच पहुंचकर गंवा बैठें। सरकार की अभी पूरी तरह से जीत नहीं हुई है। वास्तविक जीत के लिए तो यूपीए सरकार की असली लड़ाई अब शुरू हुई है। देखना यही है कि यह लड़ाई किस मोड़ पर पहुंचकर किस तरह से खत्म होती है।