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गुरुदत्त पर एक और किताब

परदे के पीछे.सत्या सरन ने ‘टेन इयर्स विद गुरुदत्त : अबरार अल्वीस जर्नी’ नामक किताब प्रस्तुत की है। ज्ञातव्य है कि नागपुर से आए, पढ़े-लिखे जहीन अबरार अल्वी ने गुरुदत्त की अधिकांश फिल्में लिखी हैं और उन्हें गुरुदत्त का निकट मित्र माना गया है। गुरुदत्त को देवआनंद ने निर्देशन का अवसर दिया था। गुरुदत्त के निकटतम मित्र जॉनी वाकर रहे हैं।

बेचारे अबरार अल्वी दशकों से यह बात चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ‘साहब बीवी और गुलाम’ सचमुच उन्होंने ही निर्देशित की थी, परंतु हर फ्रेम पर गुरुदत्त का प्रभाव इतना साफ है कि लोग उन पर विश्वास नहीं करते। यही हाल राधू करमरकर का रहा कि किसी ने यकीन ही नहीं किया कि ‘जिस देश में गंगा बहती है’ उन्होंने निर्देशित की थी। अबरार अल्वी को कामयाब फिल्म के बाद भी दूसरा अवसर नहीं मिला। यही हाल अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘डॉन’ के निर्देशक चंद्रा बारोट का रहा। बहरहाल अबरार अल्वी का यह कहना कि ‘चौदहवीं का चांद’ एम. सादिक ने नहीं, वरन गुरुदत्त ने निर्देशित की थी, उनके दावे को कमजोर करता है।

इसी तरह उनका यह खयाल कि कैमरामैन वीके मूर्ति को गुरुदत्त ने ही बनाया, भी भ्रामक है। मूर्ति को सभी गुणवान तकनीशियन जीनियस ही मानते रहे हैं। मूर्ति ने एक जगह लिखा है कि ‘साहब बीवी और गुलाम’ के नृत्य ‘सुना है तेरी महफिल में रतजगा है’ के लिए बुलाई गई सह कलाकारों के चेहरे सुंदर नहीं थे, अत: शॉट संयोजन इस ढंग से किया गया कि चेहरों पर प्रकाश नहीं है और केवल प्रमुख कलाकार मीनू मुमताज का चेहरा दिखाया गया है। इसी तरह उन्होंने ‘प्यासा’ के ऑडिटोरियम दृश्य का भी खुलासा किया है।

दरअसल गुरुदत्त जैसे प्रतिभाशाली फिल्मकार की फिल्मों के हर पक्ष पर उनकी मजबूत पकड़ रही है और उनकी सिनेमाई शैली स्पष्ट रेखांकित है। सिनेमा केवल निर्देशक का माध्यम है और सारे तकनीशियन तथा कलाकार उसकी विराट कल्पना को साकार करने में महज उसके सहायक हैं। अत: किसी को किसी काम का पूरा श्रेय मिल नहीं सकता। अपना काम ठीक से नहीं जानने वाले निर्देशकों पर तकनीशियन और कलाकार हावी हो जाते हैं। अब अबरार अल्वी का कोई दोष नहीं।





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