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आनलाइन तस्वीरें बनीं ‘सबूत’ का नया स्रोत

न्यूयार्क. फेसबुक और मायस्पेस जैसी सोशल नेटवर्किग साइट्स से अब तक न सिर्फ जासूसों को आपराधिक मामले हल करने में मदद मिलती आई है, बल्कि नियोक्ता भी अपने नए कर्मचारियों की पृष्ठिभूमि की जांच में इनका इस्तेमाल करते रहे हैं। मगर अब कानूनी मामलों में आरोपियों को और अधिक कड़ी सजा दिलाने के लिए अभियोजन पक्ष इन साइट्स पर मौजूद तस्वीरों को भी आधार बना रहे हैं।

अमेरिका में जोशुआ लिप्टन (20) नामक एक युवक ने शराब के नशे में अपने वाहन से एक महिला को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। दो हफ्ते बाद ही उसने एक हैलोवीन पार्टी में शिरकत की, जिसमें उसने एक जेल के कैदी जैसे पकड़े पहने थे। पार्टी में खींची गई तस्वीरों को किसी ने फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। यही तस्वीरें दुर्घटना मामले के अभियोजन पक्ष के वकील जे. सुलिवैन ने सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश कर दीं। इन तस्वीरों के सहारे सुलिवैन ने कोर्ट में दावा किया कि लिप्टन को अपने किए का कोई पछतावा नहीं है।

एक तरफ जहां घायल महिला अस्पताल में भर्ती थी, वहीं वह पार्टियों में मजे कर रहा था। जज ने वकील के तर्क पर सहमति जताते हुए लिप्टन को दो साल कैद की सजा सुनाई।

हार्वर्ड लॉ स्कूल में बर्कमैन सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी के निदेशक फिल मैलोन ने कहा, ‘जो बातें आनलाइन कहीं जाती हैं या पोस्ट की जाती हैं वे वहां पर लगभग स्थाई तौर पर रहती हैं।’ जब तस्वीरों को सुनवाई में सबूत की तरह पेश किया जाता है तो आरोपी को इससे र्श्िमदगी तो होती ही है, वह यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि ये उसके खिलाफ महज एक अफवाह है या फिर शराब पीकर गाड़ी चलाने का मामला उसकी कभी-कभार की गलती थी।

सैंटा बारबरा कोर्ट के वरिष्ठ अभियोजन वकील डैरिल पेरलिन ने कहा, ‘प्रत्येक मामले में ऐसा करना संभव नहीं है। मगर कुछ खास मामलों में ये उपयुक्त साबित होती हैं।’





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