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वॉशिंगटन.लोकसभा में भारत-अमेरिकी असैन्य परमाणु करार को लेकर पेश हुए विश्वास प्रस्ताव और उसके नतीजों ने न केवल भारतीय, बल्कि विदेशी अखबारों में भी सुर्खियां बटोरीं तथा कई ने संपादकीय भी लिखे। यहां पेश हैं कुछ प्रमुख विदेशीअखबारों में छपीं खबरों तथा विचारों की झलकियां..
अमेरिका के अखबार ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु करार को बचाने के लिए बहुत बड़ा जोखिम लिया। अब अमेरिकी संसद की बारी है। अगस्त में लंबे अंतराल के बाद करार पर विचार के लिए अमेरिकी संसद के पास 30 से ज्यादा विधायी दिन नहीं बचे हैं। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा व्यक्त किए गए विचारों पर लिखा है कि राहुल को इसका खुलासा करना था कि करार का समर्थन क्यों किया जाए तथा इसमें रक्षा उपाय समझौतेर्, ईधन आपूर्ति और निरीक्षण जैसी तकनीकी बातों के आम आदमी के लिए क्या मायने हैं।
सरकार को मिली हरी झंडी: ब्रिटिश मीडिया
ब्रिटिश मीडिया का सामान्य तौर पर यह मानना रहा कि विश्वास मत हासिल होने से मनमोहन सरकार को परमाणु करार पर आगे बढ़ने के लिए हरी झंडी मिल गई है। विपक्ष द्वारा कांग्रेस नीत सरकार पर रिश्वतखोरी का आरोप लगाने से मतदान की प्रक्रिया प्रभावित हुई, लेकिन नतीजा यूपीए सरकार के लिए सकारात्मक रहा।
‘द इंडिपेंडेंट’ के मुताबिक, ‘नतीजे का मतलब यह है कि अगले साल मई में जरूरी तौर पर होने वाले आम चुनाव से पहले सरकार करार पर आसानी से आगे कदम बढ़ा सकेगी।’‘द गार्जियन’ ने लिखा है कि मतदान के नतीजों से ऐतिहासिक करार पर आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।
पाक में भी प्रधानमंत्री की बल्ले-बल्ले
पाकिस्तान के तमाम अखबारों ने मनमोहन सिंह की जीत को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया है। अधिकतर अखबारों ने इस खबर को प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ पहले पन्ने पर छापा है। ‘डेली टाइम्स’ ने पहले पन्ने पर भाजपा सांसदों को लोकसभा में नोटों का बंडल लहराते दर्शाती तस्वीर छापी है। ‘डॉन’ ने लिखा है कि भाजपा के तीन सांसदों का कहना था कि यह रकम उन्हें सरकार का समर्थन करने के लिए घूस के रूप में दी गई। ‘जंग’ के अनुसार, मनमोहन ने अपने भाषण में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को करारा जवाब दिया। ‘नेशन’ ने विश्वासमत प्रस्ताव पर कामयाबी की खबर को ‘सरकार और एटमी करार दोनों बचे’ के शीर्षक से प्रकाशित किया है।