आलेख लोकसभा में विश्वास मत के नतीजों के बाद यूपीए सरकार के पास खुश होने के कई कारण होंगे। पक्ष में पड़े 275 मतों ने सरकार को सुरक्षित कर दिया, इसने भारत-अमेरिका परमाणु करार पर एक तरह से स्वीकृति की मोहर लगा दी। इसके अलावा उसके लिए खुशी की बात यह होगी कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा वोट के बदले नोट के कथित खुलासे के बावजूद अस्त-व्यस्त हालत में नजर आ रही है। अपने अनुशासन और गहरी निष्ठा के लिए चर्चित पार्टी के इतने सांसदोंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन कभी नहीं किया।
विश्वास मत के दौरान राहुल गांधी ने साधारण मगर प्रभावी लहजे में कहा कि हमें आगे की ओर देखना चाहिए और डर के साथ नहीं वरन उम्मीद के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके शांत-शिष्ट लहजे से उलट यह हमारे प्रधानमंत्री ही थे जिन्होंने अपने समापन भाषण में उग्र भाषा का इस्तेमाल किया जिसकी कॉपी सदन की टेबल पर रखी गई।
यह संभवत: पहली बार था जब हमारे धीर-गंभीर प्रधानमंत्री ने इतने जबरदस्त तरीके से विपक्षी नेता पर हमला बोला। जो कुछ भी हो लेकिन इससे मुश्किलों में घिरी कांग्रेस को एक टॉनिक जरूर मिला होगा, जिसके पास अब ऐसा नेतृत्व है जो आक्रामक भी हो सकता है।
परमाणु करार की सर्वश्रेष्ठ तर्कसंगत व्याख्या तो विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने की। उन्होंने इसे राष्ट्र मंडल के साथ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु तकनीकों और पदार्थो के आदान-प्रदान के हिसाब से भारत की सक्षमता के रूप में देखा। मुखर्जी के मुताबिक सरकार उसी राह पर चल रही है, जिसका सपना कभी जवाहरलाल नेहरू और होमी जहांगीर भाभा ने देखा था।
अपने दशकों लंबे संसदीय कैरियर में लालकृष्ण आडवाणी ने संभवत: पहली बार ऐसा भाषण दिया जो बिलकुल निष्प्रभावी था। बकौल आडवाणी ‘करार न करने के पीछे अकाट्य तर्क थे; करार का मतलब है कि देश अब और परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। कांग्रेस गठबंधन के धर्म को नहीं समझ सकी और न ही उसका पालन कर पाई।’ उन्होंने बड़े ही अच्छे तरीके से इस बात को समझाया कि किस तरह उनकी पार्टी ने भारत-अमेरिका के सामरिक सहभागिता का समर्थन किया और वह केवल मौजूदा करार के खिलाफ है।
एनडीए के लिए यह भी उतनी ही चिंता की बात रही। भाजपा और शिवसेना जैसी सख्त अनुशासन वाली पार्टियों वाले खेमे से इस कदर हुई क्रॉस वोटिंग ऐसे समय में भविष्य को लेकर घबराहट की निशानी थी, जब गठबंधन को आक्रामक मूड में होना चाहिए। कुछ हद तक समस्या यह थी कि मुख्य विपक्षी दल का दिल इस लड़ाई में नहीं था।
तीसरे मोर्चे के फिर से अभ्युदय ने अचानक एनडीए के योजनाओं पर पानी फेर दिया। यहां, करार ने उत्प्रेरक की तरह काम किया। इसने मुलायम और कांग्रेस के नए रिश्ते की राह तैयार की। नया मोर्चा साफ तौर पर करार के खिलाफ खड़ा नजर आया जबकि यूपीए इसके पूरी तरह समर्थन में एकजुट था। भाजपा बीच में ही फंस गई।
बाद में बसपा भी वामदलों और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर साथ आ गई। परमाणु करार की घोर निंदा और गरीब व निचले तबके की चिंता ऐसे दो मुद्दे थे जिन पर उसका जोर रहा। माकपा के मोहम्मद सलीम के मुताबिक वामदल-यूपीए का हनीमून का अंत नए विकल्प की शुरुआत है, जिसे खुद प्रधानमंत्री में तैयार किया। मुलायम सिंह के यू-टर्न के बाद उनकी पार्टी ने जिस तेजी से मायावती के साथ हाथ मिलाया वह व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलावों का पूर्वाभास देता है।
सरकार भले ही सुरक्षित हो, लेकिन नवगठित तीसरे मोर्चे में इतनी क्षमता है कि वह सत्ताधारी पार्टी के समक्ष तगड़ी चुनौती पेश कर सके जैसी भाजपा नहीं कर सकती। मायावती जो लोकसभा की सदस्य भी नहीं थीं, ने एक प्रेस कांफ्रेस के जरिए जिस तरह से इस परमाणु करार को ईरान पर अमेरिका के हमले की आशंका से जोड़ते हुए इसे गरीब विरोधी ठहराया वह काफी महत्वपूर्ण है।
आखिर में अपने पक्ष में वोट जुटाने के लिए विपक्षी सांसदों को डराने-धमकाने और धनबल के इस्तेमाल के आरोपों के चलते भी काफी हलचल रही। भाजपा के तीन सांसदों ने जहां सदन के पटल पर नोटों के बंडल रखते हुए सासंदों की खरीद-फरोख्त को साबित करने की कोशिश की, वहीं बसपा ने भी आरोप लगाया कि उनके सांसदों पर दबाव बढ़ाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया जा रहा था। माकपा के प्रकाश करात ने दावा किया कि उनके पास इस बात का तारीखवार ब्यौरा है कि कब-कब उनकी सहयोगी पार्टियों के सांसदों के साथ इस संदर्भ में संपर्क किया गया।
सदन में जीत हासिल करने के तरीके सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं। 1993 में नरसिंह राव ने लोकसभा में ऐसे ही हंगामे के बीच अविश्वास प्रस्ताव को 251 के मुकाबले 265 मतों से परास्त कर दिया। विचित्र संयोग है कि इस बार यूपीए ने 275 मतों के साथ विपक्ष पर 19 मतों से जीत हासिल की, जबकि दस सांसदों ने वोट नहीं डाला। हालांकि यह बहुमत काफी नाजुक है जो सांसदों के व्यक्तिगत अस्थायी जुड़ाव से आया है, न कि मजबूत राजनीतिक संबंधों के आधार पर बना है।
कांग्रेस का एकमात्र नया गठजोड़ सपा के साथ हुआ है और सपा निश्चित ही इसकी कीमत वसूल करेगी। शीर्ष प्राथमिकता तो उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ बेहिसाब संपत्ति जमा करने के मामलों को दी जा सकती है। इस मामले पर एक बार यह आगे बढ़ेगी तो यह साफ हो जाएगा कि सरकार ने अपने हाथ में एक नई लड़ाई मोल ले ली है।
वैसे नवगठित तीसरा मोर्चा ही यूपीए के लिए बड़ी चुनौतियां पेश करेगा। यूपीए द्वारा सदन में विश्वास मत हासिल करने के बाद सरकार का पहला कदम संभवत: मायावती के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार करना होगा। यह कदाचित मायावती को अपने नवगठित मोर्चे को मजबूत करने का अवसर दे सकता है। कांग्रेस इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि बसपा का उत्तर और मध्य भारत के कई ऐसे राज्यों में विस्तार है जहां इन सर्दियों में चुनाव होने वाले हैं।
इस सारी कवायद में नए गठजोड़ों का उभरना काफी महत्वपूर्ण है जो समग्र रूप से व्यवस्था में शक्तियों के पुनर्गठन का आगाज कर सकते हैं। कांग्रेस तो दोहरे दबाव में होगी। लोकसभा की जंग भले ही खत्म हो गई हो लेकिन देश को आने वाले दिनों में और भी लड़ाइयों के लिए तैयार रहना होगा।
-लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।