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भोपाल. प्रदेश के सरकारी स्कूलों की प्रयोगशालाओं की दशा सुधारने के लिए 20 साल पहले शुरू की गई एक योजना दम तोड़ने की कगार पर है। इसके तहत भोपाल में प्रयोगशालाओं के उपकरण तैयार करने के लिए वर्कशाप शुरू की जानी थी, उसकी स्थापना हो गई, वहां करोड़ों रुपए की मशीन भी लगा दी गई, लेकिन काम आज तक शुरू नहीं हुआ है। आज राज्य की करीब दो हजार शालाएं प्रयोगशाला विहीन हैं और उनके उपकरण तैयार करने के लिए वर्कशाप में लगाई गई मशीन कबाड़ में तब्दील होने लगी हैं।
यह वर्कशाप राजधानी के जिला शिक्षा व प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) परिसर में स्थापित की गई थी, जिसमें 20 साल पहले दो करोड़ रुपए की मशीन लगाई गई थीं, जिनकी कीमत आज लगभग छह करोड़ रुपए है। स्कूलों की प्रयोगशालाओं में लगने वाले उपकरण तैयार करने के लिए स्थापित इस वर्कशाप के बारे में स्कूल शिक्षा विभाग के मौजूदा अधिकारी कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं हैं।
पूरे प्रदेश में करीब दो हजार सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां आज भी लैब नहीं हैं। कई स्कूल ऐसे हैं जहां लैब के नाम पर केवल कमरे हैं। यदि यह वर्कशाप काम कर रही होती तो शायद यह स्थिति नहीं होती। सूत्रों के अनुसार लैब के उपकरण तैयार करने के लिए मप्र में केवल ग्वालियर में एक फेक्टरी है। इसके अलावा उपकरण हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से ही मंगाए जा सकते हैं।
क्या थी योजना : सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने 1986 में इंडो-जर्मन प्रोजेक्ट के तहत मप्र और महाराष्ट्र में स्कूली प्रयोगशालाओं में लगने वाले उपकरणों के लिए एक वर्कशाप स्थापित करने की योजना तैयार की थी। महाराष्ट्र में तो यह वर्कशाप बेहतर काम कर रही है लेकिन मप्र में योजना ठप हो गई। 1986 में मशीनें आने के बाद 1988 में नौ टेक्निशियन भर्ती किए गए और 1992 में वर्कशाप का उद्घाटन भी हुआ, लेकिन उपकरण तैयार होने का काम चालू नहीं हो पाया।
विभाग की लापरवाही का एक नमूना यह भी है कि जर्मनी से आई टूल एंड कटर ग्राइंडर मशीन आज भी मुंबई बंदरगाह पर रखी हुई है। विभाग इस मशीन के लिए 20 लाख रुपए कस्टम ड्यूटी अदा कर चुका है, लेकिन इसके बाद उसे भोपाल तक लाने के प्रयास औपचारिकताओं तक सिमट कर रह गए। बाजार से खरीदे गए करीब पांच सौ किट भी वर्कशाप में बंद धूल खा रहे हैं।
किस हालत में हैं मशीनें
डाइट परिसर में बने करीब 1800 वर्ग फीट के एक हाल में यह मशीनें रखी हुई हैं। इन मशीनों के प्लेटफार्म भी तैयार हैं। कमरा बंद है लेकिन उसके खिड़कियां टूट गईं हैं। फिलहाल इन्हें प्लाई बोर्ड से बंद कर रखा है। हालत देखने के बाद यहां चोरी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
इंदौर के इंडस्ट्रीयल कंसलटेंट जयंत आठले के अनुसार बीस साल से अनुपयोगी मशीनों को दोबारा चालू करना आसान नहीं है। मशीनों की रिकंडीशनिंग संभव तो है लेकिन यह तब ही कराना चाहिए जब उनका अलाइनमेंट ठीक हो और खर्च लागत के तीस प्रतिशत से अधिक न हो। मशीनों का परीक्षण करने के बाद ही यह बताया जा सकता है कि यह मशीनें अब उपयोगी हैं या नहीं।
क्या कहते हैं अधिकारीमुझे वर्कशाप की जानकारी नहीं है। यदि ऐसी वर्कशाप है तो वह हमारे बहुत काम की है। हम तत्काल उसका निरीक्षण करेंगे और शुरू करने का प्रयास करेंगे।
-मदनमोहन उपाध्याय,प्रमुख सचिव (स्कूल शिक्षा)
कितना खर्च हुआ (1986 में)
मशीनों की कीमत2 करोड़
कर्मचारियों के प्रशिक्षण व विदेश यात्रा12 लाख
भवन निर्माण8 लाख
पावर हाउस 1.25 लाख
प्लास्टिक मोल्डिंग मशीन के लिए
कूलिंग सिस्टम1 लाख
प्रशिक्षण किट1 लाख 60
एक्साइज ड्यूटी20 लाख
टाइम लाइन
1986 : साइंस किट वर्कशाप की स्थापना
1988 : टेक्निशियनों की भर्ती
1989 : मैनेजर व टेक्निशियनों का प्रशिक्षण
1990 -92 : लैब टेक्निशियनों का प्रशिक्षण
1992 : उद्घाटन (फिर ताला डल गया)
इतने स्कूलों में लैब नहीं
हाई स्कूल : 1774
हायर सेकंडरी : 235
(जिन स्कूलों में लैब है वहां भी हर साल उपकरणों की जरूरत पड़ती है।)